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07 September, 2014

काले झंडे के तले, रही मनुजता काँप-

खूनी धरती झेलती,  युगों युगों का शाप । 
काले झंडे के तले, रही मनुजता काँप । 

रही मनुजता काँप, क़त्ल कर जश्न मनाता। 
बग़दादी का वार,  गोश्त जिन्दों का खाता  । 

वह दारुल इस्लाम, किन्तु हैं लोग जुनूनी । 
गैर धर्म कर साफ़, खेल फिर खेलें खूनी ॥ 

10 comments:

  1. रक्त-बीज कहें तो कैसा रहे !

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  2. वह दारुल इस्लाम, किन्तु हैं लोग जुनूनी ।गैर धर्म कर साफ़, खेल फिर खेलें खूनी ॥....behtareen

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  3. बहुत सुन्दर ! यथार्थ है !

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  4. साफ़ साफ़ सटीक शब्दों की बयानी ...

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  5. सशक्त अभिव्यक्ति अपने वक्त से संवाद करती हुई .

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  6. बहुत सुन्दर

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  7. सही कहा, सुंदर कहा।

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