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20 October, 2014

चुवा केंचुवा अश्रु, असह मछली के दुखड़े-


दो टुकड़े केंचुवे के, बँटे बने दो जीव ।
एक छली मछली  छले, दूजा भला अतीव।

दूजा भला अतीव, भूमि कर रहा भुरभुरी । 
बना रहा यह खाद, पौध के लिए जरुरी । 

चुवा केंचुवा अश्रु, असह मछली के दुखड़े। 
कर कर पश्चाताप, हुवा फिर से दो टुकड़े ॥ 

5 comments:

  1. वाह केंचुए को भी रचना में बाँधना कोई आप से सीखे ...
    लाजवाब दिनेश जी ... बधाई दीपावली की ...

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  2. बहुत बढ़िया...बधाई आपको...

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