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25 November, 2014

प्राचीन संस्कृति के जगें संस्कार पावन सर्वदा- R S S गीत

आओ चलो शाखा चलें, खेलें ध्वजा भगवा तले । 
प्रात: चलें संध्या चलें, चलते चलें चलते चलें॥ 
विजया विजयनी शक्ति दे, कल्याणकारी कार्य कर ।
भारत जगत-जननी सरिस, इस शक्ति में औदार्य भर ।
माँ शील दे सद्ज्ञान दे, विज्ञान अग्रेसर बने ।
जन वीरव्रतधारी बने, गण धीर धर सागर बने ।
गंगा बहे गीता गहे सर्वत्र गो माता पलें ।
आओ चलो शाखा चलें, खेलें ध्वजा भगवा तले । 
प्रात: चलें संध्या चलें, चलते चलें चलते चलें॥ 
हो ध्येय में विचलन नहीं ।  समुदाय में विघटन नहीं । 
निष्ठा-प्रबल हो देश हित । हो आचरण भी संयमित । 
प्राचीन संस्कृति के जगें संस्कार पावन सर्वदा ।
गाण्डीव अर्जुन का उठे, हनुमान की मारक गदा ।
कटिबद्ध जब प्रभु कार्य हित,  हर आपदा विपदा टले ।
आओ चलो शाखा चलें, खेलें ध्वजा भगवा तले । 
प्रात: चलें संध्या चलें, चलते चलें चलते चलें॥ 
आदत बदलती संघ में, सेहत सुधरती संघ में । 
उत्थान के साधन यहाँ, ले सीख योगासन यहाँ । 
हर जिंदगी सादी बने, पर देह फौलादी बने। 
नव-संगठनकर्ता बने, दारिद्र्य दुख-हर्ता बने । 
देखें परम वैभव नयन, दुर्गुण कलुष ईर्ष्या जले । 
आओ चलो शाखा चलें, खेलें ध्वजा भगवा तले । 
प्रात: चलें संध्या चलें, चलते चलें चलते चलें॥ 

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