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26 January, 2015

जिंदगी के धूप में या छाँह में,-

धूप में आनन्द लेते जाइए । 
छाँह में मुस्काइये, सुस्ताइए । 
जिंदगी के धूप में या छाँह में, 
घबराइये न और न इतराइये ॥ 

6 comments:

  1. सक्स्ह लिखा है ...जिंदगी हर कदम बदलती है .. बस देखते जाइए ...
    गणतंत्र दिवस की शुभकामनायें ...

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  2. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (27-01-2015) को "जिंदगी के धूप में या छाँह में" चर्चा मंच 1871 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    गणतन्त्रदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सही है दोनों स्‍तर पर सन्‍तुलन आवश्‍यक है।

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  4. बहुत सुन्दर सार्थक सृजन, बधाई

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