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09 February, 2015

स्वतंत्र दोहे


सच्चा सौदागर बिका, सच्चा सौदा नाय ।
इस झूठे बाजार में, झूठा माल बिकाय॥

भाँय भाँय करता भवन, किन्तु भाय ना भाय ।
जब लुभाय ससुरारि तब, माँ भी धक्का खाय ॥

गैरों ने काटा गला, झटपट काम-तमाम । 
अपने तो रेता किये, लिए एक ही काम ॥ 

खोटे सिक्के चल रहे, गजब तेज रफ़्तार |
गया जमाना यूँ बदल, इक्के भी बेकार || 

जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||  

19 comments:

  1. भाँय भाँय करता भवन, किन्तु भाय ना भाय ।
    जब लुभाय ससुरारि तब, माँ भी धक्का खाय ॥
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  2. ज़बर्दस्त कटाक्ष है वर्त्तमान सामाजिक अवस्था पर!!

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  3. सार्थक दोहावली।
    आज देहरादून में हूँ। कल घर पहुँच जाऊँगा।

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  4. हाँ और ये भी मती पूछो रै तू आदमी है की जिनावर.....

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  5. बहुत सटीक दोहे...

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  6. बहुत खूब सर जी।

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  7. बहुत खूब सर जी।

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  8. बहुत सुंदर.

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  9. जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
    मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||

    बहुत खूब !

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  10. आपको सपरिवार होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ .....!!
    http://savanxxx.blogspot.in

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  11. धन्यवाद, रविकर जी। आशा है भविष्य में भी आप मेरा मार्गदर्शन करते रहेंगे।शुभ रात्रि।

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  12. बहुत खूब कही रविकर भाई .मुबारक .

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  13. बहुत खूब कही रविकर भाई .मुबारक .

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  14. उत्तम रचना .

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  15. बहुत सुन्दर दोहे1

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