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04 January, 2016

रविकर के दोहे

(१)
चाहे जैसे धन मिले, रहे निधन तक चाह |
निर्धन होवे या धनी, कहाँ करें परवाह ||
(२)
नहीं हड्डियां जीभ में, पर ताकत भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियां, देखो कभी जरूर ||
(३)
जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक || 
(४)
ओवर-कॉन्फिडेंट हैं, इस जग के सब मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ || 
(५)
मंगलमय नव-वर्ष हो, आध्यात्मिक उत्कर्ष ।
बढे मान हर सुख मिले, विकसे भारत वर्ष ॥ 
(6)
बहुत व्यस्त हूँ आजकल, कहने का क्या अर्थ |
अस्त-व्यस्त तुम वस्तुत:, समय-प्रबंधन व्यर्थ ||
(7)
पक्के निर्णय क्यूँ करें, जब कच्चा अहसास। 
कच्चे निर्णय क्यूँ करें, जब तक पक्की आस।।


3 comments:

  1. सार्थक दोहे आदरणीय रविकर जी।

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  2. नहीं हड्डियां जीभ में, पर ताकत भरपूर | तुड़वा सकती हड्डियां, देखो कभी जरूर
    बहुत बढ़िया

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