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02 March, 2016

प्यास बुझी ना बावली, किया वारुणी पान-

प्यास बुझी ना बावली, किया वारुणी पान ।
हुआ बावला इस कदर, भूल गया पहचान ।।

प्यास बुझी ना बावली, रत्नाकर के पास । 
रविकर अति-लावण्यता, उड़ा रही उपहास ।।

प्यास बुझी ना बावली, बैठ घास पर जाय ।
उड़ते उड़ते ओस कण, जाते होश उड़ाय।।

प्यास बुझी ना बावली, मंदिर में घुसपैठ ।
चरणामृत का पान कर, प्रभु चरणों में बैठ ।।

प्यास बुझी ना बावली, होता गया अधीर ।
धीरे धीरे हो गई, पर्वत जैसी पीर ।।

प्यास बुझी ना बावली, करता रहा उपाय।
वृद्धाश्रम को देख के, रविकर गया अघाय |

प्यास बुझी ना बावली, लेता बच्ची गोद |
अश्रु-पान रविकर करे, छाया मंगलमोद ||

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