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25 September, 2016

दोहे-

आतप-आफत में पड़ा, हीरा कॉच समान।
कॉच गर्म होता दिखा, हीरा-मन मुस्कान।

प्रतिभा प्रभु से प्राप्त हो, देता ख्याति समाज ।
मनोवृत्ति मद स्वयं से, रविकर आओ बाज।।

सराहना प्रेरित करे, आलोचना सुधार।
निंदक दो दर्जन रखो, किन्तु प्रशंसक चार।

बिन जाने निन्दा करे, क्षमा करूँ अज्ञान।
अगर जान लेता मुझे, छिड़का करता जान।।

माफी देते माँगते, जो दिल से मजबूत।
खले खोखले मनुज को, रविकर स्वयं सुबूत।।

जोड़-तोड़ करती गणित, तीन-पाँच भरपूर।
मुर्दे गड़े उखाड़ता, पढ़ इतिहास जरूर।।

उलझे बुद्धि विचार से, लगे लक्ष्य भी दूर , 
किन्तु भक्ति कर दे सुगम, सुलझे मार्ग जरूर।।

बता सके असमय-समय, जो धन अपने पास।
किन्तु समय कितना बचा, क्या धन को अहसास।।

करे इधर की उधर नित, इधर उधर की फेक।
टांग अड़ाना काम में, देता खुशी अनेक।।

गये अकेला छोड़ के, संगी साथी खास।
हल है हर हालात् का, था मुझपर विश्वास।

सत्य सादगी स्वयं ही, रखते अपना ख्याल।
ढकोसला हित झूठ हित, खर्च कीजिए माल।।

अरुण वरुण यम इंद्र का, इस मौसम में हाथ।
कम्बल पंखा छतरियाँ, कीड़े मच्छर साथ।

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