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27 September, 2016

रावण के दस शीश सयाने ।

रावण के दस शीश सयाने ।
लाल मुढ़ैछा बांधे बायाँ, कामगार पटियाता है ।
साफा हरा चाँद तारे से, दूजा शीश सजाता है ।
दिखा तीसरा पट्टी बांधे, झट कानून बताता है ।
चौथे सिर की लम्बी कलमें, सुलझी लट उलझाता है ।
उसकी ढपली उसके गाने ।
रावण के दस शीश सयाने ।।

साधुवेश धर शीश पाचवां, सीता को हर लाया था ।
अट्ठारह हाथों ने नौ सिर,  देर तलक खुजलाया था ।
सीता ने तृण-मर्यादा का जब वो जाल बिछाया था-
दाएं से पहले वाला सिर, बहुत-बहुत झुँझलाया था |
शापग्रस्त रावण क्या करता, निज अपमान कराया था ।
क्रोधित मन वह करे बहाने ।
रावण के दस शीश सयाने ।।

क्षत-विक्षत अक्षय को देखा गला बहुत भर्राया था |
दहन देख लंका नगरी का दूजा मुख गुर्राया था |
अंगद के कदमों के नीचे सिर तीजा अकुलाया था |
पैरों ने जब भक्त-विभीषण पर आघात लगाया था |
नम-आँखों चौथे सिर ने तब, अपना दर्द  छुपाया था-
माल्यवंत नाना गुस्साने ।
रावण के दस शीश सयाने ।।


शीश बीच का चापलूस था  साथी की महिमा गाये |
दो पैरों  के, बीस  हाथ  के,  कर्म - कुकर्म  सदा भाये |
मारा रावण राम-चन्द्र ने, पर फिर से वापस आये |
नया  दशानन  पैरों  की  दस  जोड़ी  पर सरपट धाये |
दसों दिशा में बंटे शीश सब, जगह-जगह रावण छाये -
लगे आज मानवता खाने ।
रावण के दस शीश सयाने ।। 

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