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13 August, 2017

पर्यावरण-पादप-प्रबंधन पर प्रदूषण पिल पड़ा-


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, खड़े रहना और बाहर

गौ-बैल के खूंटे उखड़ते, घोंसले भी गिर गये।
हर शाख से उल्लू उड़े, तरु-देव के दिन फिर गये।
आराम करते थे कभी जिस छाँह में वे बैठकर 
आरा उठा आराध्य तरु को काटने आखिर गये।।

जब जलजला जंगल जला तो वृक्ष कैसे है खड़ा।
पर्यावरण-पादप-प्रबंधन पर प्रदूषण पिल पड़ा।
इस राष्ट्र के उत्थान का जो पथ चुना सरकार ने
लथ-पथ पड़े इस पेड़ से जाती तनिक सी हड़बड़ा।।

पड़े हैं पेड़ के पीछे, लिया फल फूल औषधि सब।
दिया छाया जलावन भी, हवा भी शुद्ध करता जब।
कुल्हाड़ी बेंट पा जाती, मिला था मूँठ आरे को
उन्हें अब तख्त की चाहत, तभी आरा चलाते अब।
कुंडलियां छंद 
आरामिक बैठा रहा, फरमाए आराम |
आरा ले आराति तब, रहा खोजता काम |
रहा खोजता काम, नजर डाली पर डाली |
आरा रहा चलाय, मूक फिर भी बनमाली |
करता रविकर खून, सकल सम्पदा सँहारा |
बंजर धरती होय, चले आरा पर आरा ||

3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (15-08-2017) को "भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन" चर्चामंच 2697 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    स्वतन्त्रता दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. उम्दा ! सत्य का अनावरण करती आपकी रचना ,आभार ''एकलव्य"

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