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24 September, 2017

रजाई ओढ़कर सोता, मगर ए सी चलाता है

 खलिश बढ़ती रही घर में, मगर कुछ बोल ना पाता।
फजीहत जब हुई ज्यादा, शहर को रंग दिखलाता।

रजाई ओढ़कर सोता, मगर ए सी चलाता है।
नहाकर पूत गीजर को, खुला ही छोड़ जाता है।
सतत् चलता रहे टी वी, जले दिन रात बिजली भी
नहीं कोई सुने घर में, बढ़ा बिल जान खाता है।
बढ़ा जो रेट बिजली का, मियां तब खूब झल्लाता।
फजीहत जब हुई ज्यादा, शहर को रंग दिखलाता।।

चला फर्लाँग भर बाइक सुबह नित दूध लाये वो।
हमेशा लांग-ड्राइव पर प्रिया के साथ जाये वो।
जरा बाजार जाना तो, फटाफट फिटफिटी लेता
जले चूल्हा बिना मतलब, बड़ा भेजा पकाये वो।
बढ़ा जो दाम ईंधन का, मिनिस्टर पर भड़क जाता।
फजीहत जब हुई ज्यादा, शहर को रंग दिखलाता।।

बड़े से मॉल में जाकर, हमेशा जेब कटवाये।
मगर फुटपाथ वालों से बहस वह रोज कर आये।
टमाटर दाल मंहगाई हमेशा किंतु रोना है
नहीं दरमाह दाई का कभी भी वह बढ़ा पाये।
बढ़ा दो फीसदी डी ए मगर हड़ताल करवाता।
फजीहत जब हुई ज्यादा, शहर को रंग दिखलाता।।


4 comments:

  1. आपका लेखन सामाजिक विषयों पर हमेशा उत्कृष्ट श्रेणी का रहता है।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26-09-2017) को रजाई ओढ़कर सोता, मगर ए सी चलाता है; चर्चामंच 2739 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. वाह!!!
    बहुत सटीक.....
    लाजवाब...

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