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30 October, 2017

मुक्तक


समस्यायें समाधानों बिना प्राय: नहीं होती।
नजर आता नहीं हल तो, बढ़ा है आँख का मोती।
करो कोशिश मिलेगा हल, समस्या पर न पटको सिर।
नही हल है अगर उसका, उसे प्रभु-कोप समझो फिर।।



परिस्थितियाँ अगर विपरीत, यदि व्यवहार बेगाना।
सुनो कटु शब्द मत उनके, कभी उस ओर मत जाना।
नहीं हर बात पर उनकी, जरूरी प्रतिक्रिया देना-
मिले परिणाम प्राणान्तक, पड़े दृष्टाँत हैं नाना।



फिसलकर सर्प ऊपर से गिरा जब तेज आरे पर।
हुआ घायल, समझ दुश्मन, लिया फिर काट झुँझलाकर।
हुआ मुँह खून से लथपथ, जकड़ता शत्रु को ज्यों ही
मरे वह सर्प अज्ञानी, कथा-संदेश अतिसुंदर।।



होता अकेला ही हमेशा आदमी संघर्ष मे ।
जग साथ होता है सफलता जीत में उत्कर्ष में।
दुनिया हँसी थी मित्र, जिस जिस पर यहाँ गत वर्ष तक
इतिहास उस उस ने रचा इस वर्ष भारत वर्ष में।।



हाँ हूँ नकलची तथ्य का, हाँ कथ्य भी चोरी किए।
पर शिल्प यति गति छंद रस लय सर्वथा अपने लिए।
वेदों पुराणों उपनिषद को विश्व को किसने दिए।
क्यों नाम के पीछे पड़े, क्यों मद्य मद रविकर पिये।।



भरोसे में बड़ी ताकत, विजयपथ पर बढ़ाता है।
खुशी संतुष्टि जीवन में हमें रविकर दिलाता है।
मगर विश्वास खुद पर हो तभी ताकत मिले वरना
भरोसा गैर पर करना हमें निर्बल बनाता है।।

4 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 31 अक्टूबर 2017 को साझा की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.com पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. वाह !!!!
    अद्भुत, अविस्मरणीय, लाजवाब.....
    होता अकेला ही हमेशा आदमी संघर्ष मे ।
    जग साथ होता है सफलता जीत में उत्कर्ष में।
    दुनिया हँसी थी मित्र, जिस जिस पर यहाँ गत वर्ष तक
    इतिहास उस उस ने रचा इस वर्ष भारत वर्ष में।।

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  3. वाह !!!!
    अद्भुत, अविस्मरणीय, लाजवाब.....
    होता अकेला ही हमेशा आदमी संघर्ष मे ।
    जग साथ होता है सफलता जीत में उत्कर्ष में।
    दुनिया हँसी थी मित्र, जिस जिस पर यहाँ गत वर्ष तक
    इतिहास उस उस ने रचा इस वर्ष भारत वर्ष में।।

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  4. आदरणीय, आपकी रचना दार्शनिक भाव का एक अनूठा संगम है। शब्दों ने भावों को क्या खूब तराशा है।

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