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06 February, 2018

दिया कहाँ परिचय दिया, परिचय दिया उजास-

रखे व्यर्थ ही भींच के, मुट्ठी भाग्य लकीर।
कर ले दो दो हाथ तो, बदल जाय तकदीर।।

प्रेम परम उपहार है, प्रेम परम सम्मान।
रविकर खुश्बू सा बिखर, निखरो फूल समान।।

फेहरिस्त तकलीफ की, जग में जहाँ असीम।
गिनती की जो दो मिली, व्याकुल राम-रहीम।।

दिया कहाँ परिचय दिया, परिचय दिया उजास।
कर्मशील का कर्म ही, दे परिचय विन्दास।।

नहीं मूर्ख बुजदिल नहीं, हुनरमंद वह व्यक्ति।
निभा रहा सम्बन्ध जो, बिन विरक्ति आसक्ति।।

कभी नहीं रविकर हुआ, पुष्ट-दुष्ट संतुष्ट।
अपने, अपने-आप से, रहे अनवरत रुष्ट।।

तन चमके बरतन सरिस, तभी बढ़े आसक्ति।
कौन भला मन को पढ़े, रविकर चालू व्यक्ति।।

4 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (07-02-2017) को "साहित्यकार समागम एवं पुस्तक विमोचन"; चर्चामंच 2872 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दिया कहाँ परिचय दिया, परिचय दिया उजास।
    कर्मशील का कर्म ही, दे परिचय विन्दास।।
    बहुत खूब!

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  3. आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १२ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

    टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

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  4. बहुत सुंदर सृजन

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