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25 August, 2017

गणपतयै नमः

हरि-ओम गणपतयै नमः जय रिद्धि जय जय सिद्धि जय।
बल बुद्धि विद्या के धनी गणपति जगत को दे अभय।
माता-पिता की परिक्रमा कर तुम हुए पूजित प्रथम।
शिव ब्रह्म शारद विष्णु नारद पूजते आगम निगम।

31 July, 2017

गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।

 गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।
कहाँ चन्दन लगाया है, कहाँ माला चढ़ाते हो।।

चलो उस पार्क में चलते, जहाँ कुछ वृद्ध आते हैं।
स्वजन सब व्यस्त हैं जिनके, चलो उनको हँसाते हैं।
सुनेंगे बात उनकी हम, कहो क्या साथ आते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।१।।

मिली गम्भीर हालत में, चिकित्सा कक्ष में लेटी।
प्रसव कल ही हुआ जैसे, लगे नवजात है बेटी।
चलो रविकर मदद करने, अगर तुम भी कमाते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।२।।

उड़ाये चार आतंकी, लगाया जान की बाजी ।
दिया बलिदान सैनिक ने, विकल पत्नी पिता माँ जी।
चलो ढाँढस बँधाते हैं, शहादत क्यूँ भुलाते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।३।।

हँसे ग्राहक खटे छोटू पड़ी बीमार माँ घर पर।
बहन छोटी करे सेवा कभी हँसकर कभी रो कर।
चलो देखो बड़ा कितना, हँसी जिसकी उड़ाते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।४।।




09 November, 2012

लौ में लोलुप-लोप, धुँआ कल्याण करेगा-




"ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक - २५



पहली प्रस्तुति  
   डेंगू-डेंगा सम जमा, तरह तरह के कीट |
    खूब पटाखे दागिए, मार विषाणु घसीट |

    मार विषाणु घसीट, एक दिन का यह उपक्रम |
    मना एकश: पर्व, दिखा दे दुर्दम दम-ख़म |

    लौ में लोलुप-लोप, धुँआ कल्याण करेगा |
    सह बारूदी गंध, मिटा दे डेंगू-डेंगा ||

दूसरी प्रस्तुति  
देह देहरी देहरा,  दो, दो दिया जलाय ।
कर उजेर मन गर्भ-गृह, कुल अघ-तम दहकाय ।

 
कुल अघ तम दहकाय , दीप दस  घूर नरदहा ।
गली द्वार पिछवाड़ , खेत खलिहान लहलहा ।

देवि लक्षि आगमन, विराजो सदा केहरी ।
सुख सामृद्ध सौहार्द, बसे कुल देह देहरी ।।

 देह, देहरी, देहरा = काया, द्वार, देवालय 
घूर = कूड़ा 
लक्षि  = लक्ष्मी 


उतरन बेशक पहनते, किन्तु मुखौटे त्याग ।
बड़े जुगाड़ी बड़े ये, अतिशय माहिर लाग ।

अतिशय माहिर  लाग, मिले सत्ता से जाके ।
जर जमीन ले भाग, गया सब चीज उठा के ।

टैक्स चुरा के खाय, देखिये फिर भी अकड़न ।
मानो नेचुरल ग्रोथ, बाँट नहिं सकती उतरन ।।


मत्तगयन्द सवैया  
मीत समीप दिखाय रहे कुछ दूर खड़े समझावत हैं ।
बूझ सकूँ नहिं सैन सखे  तब हाथ गहे लइ जावत हैं ।
जाग रहे कुल रात सबै, हठ चौसर में फंसवावत  हैं ।
हार गया घरबार सभी, फिर भी शठ मीत कहावत हैं ।।


जैसे आइ-क्यु  नापते, ख़ुशी हमारी नाप ।
धन्ना सेठों को रहे, दीवाली संताप ।

दीवाली संताप, गरीबी चार दिया से ।
चार पटाखा फोड़, मनाये पर्व हिया से ।

रखे तयारी फौज, सदा सीमा पर वैसे ।
बेचारे मन मार, मनाते जैसे तैसे ।।


 दोहे 
दे कुटीर उद्योग फिर, ग्रामीणों को काम ।
चाक चकाचक चटुक चल, स्वालंबन पैगाम ।।

हर्षित होता अत्यधिक,  कुटिया में जब दीप ।
विषम परिस्थिति में पढ़े, बच्चे बैठ समीप ।।

माटी की इस देह से, खाटी खुश्बू पाय ।
तन मन दिल चैतन्य हो, प्राकृत जग  हरषाय ।

बाता-बाती मनुज की, बाँट-बूँट में व्यस्त ।
बाती बँटते नहिं दिखे, अपने में ही मस्त ।।

अँधियारा अतिशय बढ़े , मन में नहीं उजास ।
भीड़-भाड़ से भगे तब, गाँव करे परिहास ।।


त्योहारों की टाइमिंग, हतप्रभ हुआ विदेश ।
चौमासा बीता नहीं, आ जाता सन्देश ।
आ जाता सन्देश, घरों की रंग-पुताई ।
सजे नगर पथ ग्राम, नई दुल्हन की नाई ।
सब में नव उत्साह, दिशाएँ हर्षित चारों ।
लम्बी यह श्रृंखला, करूँ स्वागत त्योहारों ।।


 रो ले ऐ अन्धेर तू, ख़त्म आज साम्राज्य ।
 प्रेम नेम से बट रहा, घृणा द्वेष   त्याज्य ।
 घृणा द्वेष अघ त्याज्य, अमावस यह अति पावन ।
स्वागत है श्री राम, आइये पाप नशावन ।
धूम आज सर्वत्र, यहाँ भी देवी  हो ले  ।
सुख सामृद्ध सौहार्द, दान दे पढ़कर रोले ।


11 April, 2012

कथा महाभारत सुनों, अवनति के दृष्टान्त

बाल्मीकि जी की लिखी, रामायण को बाँच ।
न्नति का इतिहास यह, करो ग्रहण सब साँच ।।
कथा महाभारत सुनों, अवनति के दृष्टान्त ।
दुर्गुण त्यागे अक्लमंद, गीता से मन शांत ।। 

काम वासना में फंसे, शांतनु का अन्याय ।
वंचित होती योग्यता, भीष्म हुवे असहाय ।।

सिंहासन से बन्ध रहे,  भोगा सारा देश ।
नारी के अपहरण से, अम्बा भोगी क्लेस ।।
File:Krishna and Arjun on the chariot, Mahabharata, 18th-19th century, India.jpg
पराकाष्ठा पतन की, बने नियोगी व्यास ।
धृतराष्ट सह पान्डु को, मिली भूमिका ख़ास ।

पढ़ते वेद-पुराण पर, करें नहीं व्यवहार ।
सत्य-धर्म सम्बन्ध की,  होती क्षति अपार ।।

दरकिनार कर योग्यता, आगे करते स्वार्थ ।
महा-युद्ध की घोषणा,  आगे कृष्णा-पार्थ ।।

File:Snakesacrifice.jpg 

गुण के ग्राहक बन करो, रामायण का  ध्यान ।
सिखा महाभारत रही,  होता क्यूँ अवसान ।।

23 February, 2012

पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने --

रविकर की टिप्पणी

अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
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पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती ।
उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।

 पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।
पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।

22 February, 2012

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) के उत्तर का प्रत्‍युत्तर


रविकर--
 माता होय कुरूप अति, होंय पिता भी अंध |
वन्दनीय ये सर्वदा, अतिशय पावन बंध ||
बंध = शरीर

उच्चारण अतिशय भला, रहे सदा आवाज |
शब्द छीजते हैं नहीं, पञ्च-तत्व कर लाज ||

देव आज देते चले, फिर से पैतिस साल |
स्वस्थ रहेंगे सर्वदा, नौनिहाल सौ पाल ||

रूप चंद्र रस पान करें , रवि रतनारे नैन
सरसों सरसी सुर सधे,मधुर मधुर मधु बैन.

गेहूँ गाय गीत गज़ल, सरसों करे सिंगार
नील वसन में श्याम जू,मानो आये द्वार.

शौक हुआ सिलवा लिया, बंद गले का सूट
सजनी गर तारीफ करें , पैसे जायें छूट.

नेह रेशमी डोर फिर , माँझे का क्या काम
प्रेम पतँगिया झूमती, ज्यों राधा सँग श्याम.

ऋतु आवत जावत रहे, पतझर पाछ बसंत
प्रेम पत्र कब सूखता ? इसकी आयु अनंत.

शास्त्री जी व रविकर जी को सादर............
प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
जबरदस्त ये भाव हैं, निगमागम का रूप ।

तन-मन मति निर्मल करे, कुँवर अरुण की धूप ।।

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
dineshkidillagi.blogspot.com
प्रत्‍युत्तर दें

 सम्बंधित दोहे-

आदरणीय रविकर जी ने
मेरे चित्र पर दो टिप्पणियाँ की थी!
रविकर Feb 21, 2012 04:16 AM
गेहूं जामे गजल सा,
सरसों जैसे छंद |
जामे में सोहे भला,
सूट ये कालर बंद ||
प्रत्‍युत्तर दें
उत्तर
रविकर Feb 21, 2012 04:19 AM
सुटवा कालर बंद ||
उसी के उत्तर में पाँच दोहे
आदरणीय रविकर जी को
समर्पित कर रहा हूँ!
-0-0-0-0-0-
रविकर जी को भा रहा, अब भी मेरा रूप
वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसी धूप।१।

गेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट में, ढकी ढोल की पोल।२।

मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।३।

कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चला, बिन बाँधे ही छोर।४।

पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
ना जाने कब डाल से, पका पान झड़ जाय।५।

31 January, 2012

समाचार बिहार से --

उल्लू  बैठा माथ पर,  लक्ष्मी जी के आज ।
नगरवासियों ने किया, खुद पर बेहद नाज । 

great horned owl
खुद पर बेहद नाज, समझ कर कृपा उनकी ।
पूजै लागे लोग, याचना करते धन की ।

  A woman wearing red and gold clothes,standing in a lotus that is on water, has four arms, and is holding a lotus in her back hands.
धनवर्षा कब होय, लगाकर बैठे चुल्लू ।
हर्षित दर्पण मध्य, ताकते जाते उल्लू ।।

20 October, 2011

द्वन्द्व-दोहा : राजा जनक को समर्पित

आना-जाना एकसर, कर इसका एहसास |
साथ दूसरे का नहीं, केवल प्रभु-विश्वास ||
File:Janaka welcomes Rama.jpg
रहे  अकेला  तो  खले,  गले  गले  तक  देह |
बुद्धि-कर्ण-मुख-नासिका, बन्दर-बन्द-सनेह ||

द्वन्द्व पूरते द्वन्द्व हो, द्वादसबानी दंग |
जीवन गण-संघर्ष से, बन्दा  होता तंग ||
द्वादसबानी= सूर्य सा चमकदार / प्रखर / खरा/ चोखा/ सच्चा/ पक्का
द्वन्द्व = दो / युगल / संघर्ष  

एकाकी योगी रहे, भोगी चाहे गेह |
शान्ति पाए वही जो, देहातीत "विदेह" || 
एकाकी-पन कष्टकर, द्वन्द्व निकाले आह |
अनुभूती एकत्व की, गण में हो निर्वाह ||