मिली मदमस्त महबूबा मुझे मंजिल मिली मेरी।
दगा फिर जिन्दगी देती, खुदारा आज मुँहफेरी।
कभी भी दो घरी कोई नहीं यूँ पास में बैठा
सुबह से ही मगर घरपर, बड़ी सी भीड़ है घेरी।
अभी तक तो किसी ने भी नहीं कोई दिया तोह्फा।
मगर अब फूल माला की लगाई पास में ढेरी।
तरसते हाथ थे मेरे किसी ने भी नहीं थामा
बदलते लोग कंधे यूँ कहीं हो जाय ना देरी।
कदम दो चार भी कोई नही था साथ में चलता
मगर अब काफिला पीछे, हुई रविकर कृपा तेरी।।
दगा फिर जिन्दगी देती, खुदारा आज मुँहफेरी।
कभी भी दो घरी कोई नहीं यूँ पास में बैठा
सुबह से ही मगर घरपर, बड़ी सी भीड़ है घेरी।
अभी तक तो किसी ने भी नहीं कोई दिया तोह्फा।
मगर अब फूल माला की लगाई पास में ढेरी।
तरसते हाथ थे मेरे किसी ने भी नहीं थामा
बदलते लोग कंधे यूँ कहीं हो जाय ना देरी।
कदम दो चार भी कोई नही था साथ में चलता
मगर अब काफिला पीछे, हुई रविकर कृपा तेरी।।