Showing posts with label गजल. Show all posts
Showing posts with label गजल. Show all posts

17 September, 2017

सुबह से ही मगर घरपर, बड़ी सी भीड़ है घेरी-

मिली मदमस्त महबूबा मुझे मंजिल मिली मेरी।
दगा फिर जिन्दगी देती, खुदारा आज मुँहफेरी।

कभी भी दो घरी कोई नहीं यूँ पास में बैठा
सुबह से ही मगर घरपर, बड़ी सी भीड़ है घेरी।

अभी तक तो किसी ने भी नहीं कोई दिया तोह्फा।
मगर अब फूल माला की लगाई पास में ढेरी।

तरसते हाथ थे मेरे किसी ने भी नहीं थामा
बदलते लोग कंधे यूँ कहीं हो जाय ना देरी।

कदम दो चार भी कोई नही था साथ में चलता
मगर अब काफिला पीछे, हुई रविकर कृपा तेरी।।

17 October, 2012

दवा जहाँ पर विकट मर्ज की, बंद वहाँ का पल्ला है-

पुरानी रचना-
उच्च-सदन में हल्ला है ।
मुख-मुन्ना दुमछल्ला है ।।

जोरू ही जोते जमीन जब 
बैठा मरद निठल्ला है ।।

विकलांगो के रिक्शे पर 
बैठ चुका गोरिल्ला है ।। 

जान कौड़ियों में बिकती 
मँहगा राशन गल्ला है ।।

देह-देहली  देहली की 
बिन भूतल दस-तल्ला है ।।

विकट मर्ज की दवा इधर 
बंद यहाँ का पल्ला है ।।

अब भी कोशिश जारी है-
मरता नहीं मुहल्ला है ।।

बेच रहा रविकर जमीर 
कायनात कुल दल्ला है ।।

11 October, 2012

कूँची नहीं कटारी है : गजल कहने की कोशिश

रूह बदन पर भारी है ।
ये कैसी बीमारी है ।।

दुराचार का एक आरोपी  
भैया का व्यवहारी है ।।

 माया ने सबको लूटा-
 अब तो अपनी बारी  है ।।

ये आड़ी तिरछी रेखाएं -
कूँची नहीं कटारी है ।।

मँहगाई जिसको कहते -
 यक कोड़ा सरकारी है ।।

घोटाला उनकी नज़रों में 
एक खबर अखबारी है ।।

भ्रूण-नष्ट दुर्गा के रविकर । 
महिषा अत्याचारी है ।।