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08 January, 2012

नव-वर्ष

कर्तव्य - पथ 
बिसराता मनुष्य 

अधिकार पर 
हर्षाता युग
निकृष्ट जीवन 
आत्मा अशुद्ध

भूलते यथार्थ 
अनर्गलता पुष्ट 
 चेतो रे चश्मों 
बहाओ प्रेम-नीर

देखने को हर्षित 
नव-वर्ष है अधीर  

10 July, 2011

प्रीत के गीत नहीं बिसराना,

सुन  लो  मेरे  मीत,  प्रीत  के  गीत  नहीं बिसराना,
अब अतीत की रीत, जीत कर भीत नहीं कहलाना |

व्यथा  कथाएं  कहते-कहते  हुई  लेखनी  कुंठित,
अब वियोग्मय रचनाएं तुम, 'रविकर' न रचवाना |

मन-मयूर मेरी  मद-मस्ती  मग-मग में महकाए,
मधु-मेधा मनहर  मन-मंदिर मानस पे छा जाना |

तेरे हित कल मैंने  स्वर-सरगम  था  शाश्वत छेड़ा,
नित-प्रति मधुरिम वाणी से संगीत सुधा सरसाना |

टूटा  मेरा  करकंगन   पर  नहीं   दुखी   है  मानस,
पल - पल  मेरे  प्यारे  प्रियतम,  ऐसे  ही  हरसाना ||

03 July, 2011

हँसती -खिलखिलाती : गजल

यूँ  भी  कभी  हैं  होते  ये चश्म-नम ख़ुशी में।
तेरे शोख-चश्म जब भी करते सितम ख़ुशी में।।

यह मंज़िले-मुहब्बत आख़िर मुझे मिली जो,
दिल बाग-बाग होवे,  बहके  क़दम ख़ुशी में।

तेरी  सूरतो-सीरत  ही  मेरा  बनी  सहारा,

आने से तेरे लहके यह घर-चमन ख़ुशी में।

यह  छेड़-छाड़  तेरी, तेरा  बहुत  सताना,
हैं राहे-उल्फ़त आसाँ करते सनम ख़ुशी में।

मुझको  तेरा  सताना  और ग़मज़दा बनाना,

फिर चुपके-चुपके हँसना चहके हैं हम ख़ुशी में।

ऐ  जान - जाने - जाना   मेरे  क़रीब  आना !
पारस सा छू दो ‘रविकर’ दमके बदन ख़ुशी में।।

( गजल की बारीकियां समझाने के लिए )
http://cbmghafil.blogspot.com/
श्रीमान चन्द्र  भूषण  मिश्र  'गाफिल'
का आभार | )

18 June, 2011

गुलाबी-पाती

             (1)
सहते गम 
भटके हम 
थकते पैर
ढेरै -  देर
करते सैर 
हुई कुबेर ||

भूले गम 
लौटे हम  
मिटते भ्रम 
आँखे नम  
देखे  कम
तेरे सम ||

भूलो बैर 
पूछो खैर 
अपने तुम 
क्यूँ गुमसुम
आगे और
दिल न तोड़ ||

बदले दौर
करिए गौर 
बारम्बार
वो कुविचार 
मन का मैल
कोल्हू बैल 
वो सन्ताप
अब चुपचाप 
दिल कर साफ
कर दे माफ़  || 
                           (2) 
दो  दिन  से  पुरजोर  है,  झारखण्ड में बारिश | 
तूफानी अंदाज हैं , करिए जरा सिफारिस |
करिए जरा सिफारिस , बेगम को आना है -
अर्ध-रात्रि  के बाद, अभी  स्टेशन  जाना है |
पर  रविकर घबरात, नहीं  वो  इस बारिश से-
हुए  अगरचे   लेट ,   डरे  बेगम के रिस से ||
               ( आज १८-१९ जून की  रात 2 से 4 धनबाद R. S. पर था )


16 June, 2011

33 -साल बाद मिला पत्र

झुर-मुटों    में   बैठ  कर  नैना  लड़ाती |
वादियों  में  साथ  मिलकर गीत गाती |

रूठ  करके  मानती,  तुमको   मनाती |
पास   झूले   पर  बिठा  झूला  झुलाती |

साइकिल  पर संग सचमुच बैठ जाती |
और जाकर पार्क में पिकनिक मनाती--पर 
कैरियर  तो  है  नहीं ||  ठीक हूँ  बस  मैं  यहीं ||

पुस्तकों   में   प्रेम-पत्रों   को   रखा |
कुल्फियों का स्वाद ले संग में चखा 

याद  में  मैं  रतजगी  करती   रही |
प्यार  में जीती  रही,   मरती  रही |

डांट  भी दस बार घर में  खा चुकी | 
सांसारिक बात माँ समझा चुकी --के
कैरियर  तो है नहीं ||  ठीक हूँ बस मैं यहीं || 

25 May, 2011

व्यर्थ ताने मारना तो बन्द करिए --

वो पडोसी आज तक पोछा लगाता, 
stock photo : Man milking a buffalo by hand into a bucket at the Sonepur livestock fair, Bihar, India
दूध  ग्वाले से दुहा कर रोज लाता 
हर सुबह सब्जी ख़रीदे खुद पकाता,
धुल के सारे वस्त्र नियमित फिर नहाता
DSC07648
गल्तियों पर कसम खाता गिड़गिडाता--
किन्तु बीबी जब डपटती डूब मरिये 
हौज में पानी भला किस हेतु भरिये ?


आठ घंटे चाकरी में जा बिताया, 
चार घंटे रोज बच्चों को पढाया---
http://www.simply-kids-play.com/image-files/kids-play-01.jpg
खेल नियमित शाम को संगमें खिलाया,
बागवानी का नया जो शौक आया
http://www.popupcanopies.org/wp-content/uploads/2010/11/gardening.jpg
एक घंटे पौध में, पानी पटाया, 
तुम पटी फिर भी नहीं, तो - की करिए ?
कैंचियों का है ज़माना खुब कतरिये |

http://www.haddonfield.k12.nj.us/hmhs/academics/english/parvat1.jpg
प्रभुने किये उपकार हमपर यूँ  बड़े,
हैं आज बच्चे पैर पर अपने खड़े --

लक्ष्य भेदा, बन चुके वे लाडले, 
मौजूदगी मेरी इधर,  घर में खले

पककर कढ़ाई से गिरे, चूल्हे पड़े, 
भून करके कह रही कि जल मरिए |
ढल चुकी है शाम, 'रविकर' चल-चलिए |

27 April, 2011

सुपुत्र कुमार शिवा ( http://kushkikritiyan.blogspot.com) को लिखे पत्र , आजकल आबुधाबी में executive engineer के रूप में पदस्थापित हैं.

MNNIT, इलाहाबाद--
सीख लो तुम बात दिल की बोलना 
बोलने से ठीक पहले तोलना
            गर इजाजत दे कुशी तेरा जमीर
            राज दिल के गूढ़, अपने खोलना
जिंदगी के रास्ते बेहद कठिन
कठिन पथ से मत कभी तुम डोलना
             कर मुहब्बत की इबादत हृदय से 
             घृणा जीवन में कभी न घोलना        
गर कहानी रास्ते से भटक जाए 
खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना 
*                *                  *                 *
TCIL नई दिल्ली-- 
समस्या समय की जो हल कर चले-
जानिए जिंदगी वे सफल कर चले.
अगर दौर मुश्किल का आये भी तो 
सदा धैर्य पथ पर संभल कर चले .
दशा राहु-मंगल-शनि की सदा-
आत्म पुरुषार्थ से वे विफल कर चले.
क्रूर तूफान की जब भवर में फंसे-
डोर 'रविकर' मिली तो निकल कर चले  
जान जाये तो जाये हमें छोड़ कर 
नज्मे-गुलशन खिला दिल-बदल कर चले.
*                *               *                 * 


31 March, 2011

1999 का नव-वर्ष

वायदा किया था अठहत्तर में पर |
आज निन्यानवे का नया फेर है --
छोड़ छुट्टा दिया न रहा काम का 
अब समय-सेर के सिर सवा सेर है || 
premika-090908058.jpg


था दिया के तले तब अँधेरा बहुत 
 आज ऊपर अँधेरा दिया के किया |
  मै समझता रहा बीस बस बीस में 
   टाल इक्कीस में, क्या किया कर दिया ??


दृष्टि दोषी हुई दोष आया नजर 
पास की चीज पर ये हुई बे-असर |
किन्तु दूर-दृष्टि अभी भी सही 
ताकती जो रहीं ये तुम्हारी डगर ||
 
अब न आये तो आओगे कब तुम सनम 
  कितने पतझड़ गए,कितने मौसम गुजर |
  दिन का यौवन ढला, धूप मद्धिम हुई 
  तेज 'रविकर' घटा, कब तक ताकूँ डगर ||

30 March, 2011

ख़ुशी न मार डाले

आपके खेल न्यारे, लगे हर मेल प्यारे 
तभी तो रखते हो सिम, सेल के ढेर सारे 

वफायें छूकर निकलें , जनाजे तेरे द्वारे 
बड़ी किस्मत वाले वो, प्यार में तुझसे हारे 

चलो अच्छा है आशिक, मरे बेमौत सारे
अपुन का नंबर आया, ख़ुशी न मार डाले 

ज़रा दीदार करलूँ , अरे वो जाने वाले
लौट कर जल्दी आ जा, पड़ा मै तेरे द्वारे