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01 August, 2019

मार्ग कंटकाकीर्ण है, जीर्ण-शीर्ण पद-त्राण-

चढ़ा शिखर पर कल कलश, लेकिन आज मलीन।
चमक द्वेष-छल ने लिया, कुछ वर्षों में छीन।।

पनघट पर घटना घटी, मचा भयंकर शोर।
कलस लिए कटि कलसिरी, करे कलह पुरजोर।

नहीं जबरदस्ती सटो, मिले न रविकर चैन।
रहो दूर राजी-खुशी, पथ ताकेंगे नैन।।

हिंसक-पशु से भी बुरा, रविकर कपटी दोस्त।
करे बुद्धि को भ्रष्ट यह, पशु तो नोचे गोश्त।।

हो खुश्बू किरदार में, तब तो होगी नेह।
महकाया क्या इत्र से, रविकर तूने देह।

बगुला निगला गुलगुला, फाँका करता हंस।
कागा-कुल मोती चुगे, हँसे दुशासन-कंस।।

होंठ बड़े शातिर मिले, करे न कुछ परवाह।
चाहे जितना दिल दुखे, किन्तु न भरते आह।।

यह शक्कर की चाशनी, वह चीनी का पाक।
देह-देश के शत्रु दो, रविकर करो हलाक।।

मन की मनमानी खले, रखिये खीँच लगाम ।
हड़बड़ में गड़बड़ करे, पड़ें चुकाने दाम ।।

चुनौतियां देती बना, ज्यादा जिम्मेदार।
जीवन बिन जद्दोजहद, बिना छपा अखबार।।

जब माँ पर करती कटक, वर्तमान बलिदान।
तब भविष्य होता सुखी, होता राष्ट्रोत्थान।।

सदा आत्मघाती हुआ, नैतिकता का पाठ।
शत्रु पढ़ाये सर्वदा, सोलह दूनी आठ।।

करे प्रशंसा मूर्ख जब, खूब बघारे शान।
सुनकर निंदा हो दुखी, तथाकथित विद्वान।।

रविकर तन को दे जला, करे सुमति को भ्रष्ट।
क्रोध-अग्नि को मत दबा, दे बहुतेरे कष्ट।।

बना क्रोध भी पुण्य जब, झपटा गिद्ध जटायु।
मौन साधना, भीष्म का, कौरव की अल्पायु।।

पद पाकर पगला गए, रविकर कई पदस्थ।
पद-प्रहार औषधि सही, उन्हें रखे जो स्वस्थ।।

नित्य वेदना बढ़ रही, करे सटीक उपाय।
पढ़े वेद नाना सतत, होते राम सहाय।।।

खाली घर शैतान का, बैठे-ठाले सोच।
करूँ खाट किसकी खड़ी,लूँ किसका मुँह नोच।।

पढ़ें वेद नाना सतत, सिद्ध करें वे स्वार्थ ।
रविकर पढ़कर वेदना, करे प्राप्त परमार्थ।।

बाँध बहे, बादल फ़टे,चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़े खा रहे, खाये जहर किसान।।

ऐसा वन देखा कहाँ, ऐ सावन के सूर।
जहाँ हरेरी की जगह, भगवा हो भरपूर।।

मार्ग कंटकाकीर्ण है, जीर्ण-शीर्ण पद-त्राण।
मिले परम्-पद किस तरह, देते भक्त प्रमाण।।

हुआ इश्क नाकाम तो, कर ले मौज तमाम।
किन्तु मुकम्मल यदि हुआ, रहें चुकाते दाम।।

इश्क मुकम्मल यदि हुआ, हो शर्तिया विवाह।
हुआ इश्क नाकाम तो, अब तक है उत्साह।।




02 December, 2018

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय-

जब से झोंकी आँख में, रविकर तुमने धूल।
अच्छे तुम लगने लगे, हर इक अदा कुबूल।।

भाषा वाणी व्याकरण, कलमदान बेचैन।
दिल से दिल की कह रहे, जब से प्यासे नैन।।

जिसपर अंधों सा किया, लगातार विश्वास।
अंधा साबित कर गया, रविकर वह सायास।।

नहीं हड्डियां जीभ में, पर ताकत भरपूर |
तुड़वा सकती हड्डियां, देखो कभी जरूर ||

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय, सुनती नारि दबंग।
कमजोरी है कौन फिर, कहकर छेड़ी जंग।।

पत्नी पूछे हो कहाँ, कहे पड़ोसन पास।
वो फिर बोली 'किस'-लिए, पति बोला यस-बॉस।।

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या आदमी, मारो उसे जरूर ||

देह जलेगी शर्तिया, लेकर आधा पेड़।
एक पेड़ तो दे लगा, दे आंदोलन छेड़।।

वृक्ष काट कागज बना, लिखते वे सँदेश |
"वृक्ष बचाओ" वृक्ष बिन, बिगड़ेगा परिवेश ||

मिला कदम से हर कदम, चलते मित्र अनेक।
कीचड़ किन्तु उछालते, चप्पल सम दो-एक।।

सम्बन्धों के मध्य में, आवश्यक विश्वास।😊
करो सुनिश्चित वो कहीं, जाय न पत्नी पास।।

पैर न ढो सकते बदन, किन्तु न कर अफसोस।
पैदल तो जाना नही, तत्पर पास-पड़ोस ।।

अरे भगोने चेत जा, ये चमचे मत पाल |
झोल छोड़कर वे सभी, लेंगे माल निकाल ||

कंगारू सी मैं बनूँ, दे दो प्रभु वरदान।
ताकि फोन हो हाथ मे, थैली में सन्तान।।

बेमौसम ओले पड़े, चक्रवात तूफान।
धनी पकौड़ै खा रहे, खाये जहर किसान।।

चाय नही पानी नही, पीता अफसर आज।
किन्तु चाय-पानी बिना, करे न कोई काज।।

दिनभर पत्थर तोड़ के, करे नशा मजदूर।
रविकर कुर्सी तोड़ता, दिखा नशे में चूर।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

आँधी पानी बर्फ से, बचा रही जो टीन।
ताना सुनती शोर का, ज्यों गार्जियन-नवीन।।

जिस सुर में माँ-बाप को, देते तुम आवाज।
पुत्र उसी सुर का करे, रविकर नित्य रियाज।।

श्याम सलोने सा रहा, सुंदर रविकर बाल ।
भैरव बाबा दे बना, सांसारिक जंजाल।।

सोना सीमा से अधिक, दुखदाई है मित्र।
चोर हरे चिन्ता बढ़े, बिगड़े स्वास्थ्य चरित्र।

टूटे यदि विश्वास तो, काम न आये तर्क।
विष खाओ चाहे कसम, पड़े न रविकर फर्क।।

होती पाँचो उँगलियाँ, कभी न एक समान।
मिलकर खाती हैं मगर, रिश्वत-धन पकवान ।।

बड़ा नही धन से बने, मन्सूबे मत पाल।
तेल मसाला ले नमक, दही उड़द की दाल।|

पहली कक्षा से सुना, बैठो तुम चुपचाप।
यही आज भी सुन रहा, शादी है या शाप।।

रहा तरस छह साल से, लगे निराशा हाथ |
दिखी आज आशा मगर, दो बच्चों के साथ ||

जाग चुका अब हर युवा, करे पतंजलि पेस्ट।
बिना डेढ़ जीबी पिये, कभी न लेता रेस्ट।।

दल के दलदल में फँसी, मुफ्तखोर जब भेड़ ।
सत्ता कम्बल बाँट दे, उसका ऊन उधेड़ ।।

गली गली गाओ नहीं, दिल का दर्द हुजूर।
घर घर मरहम तो नही, मिलता नमक जरूर।।

चंद चुनिंदा मित्र रख, जिंदा रख हर शौक।
ठहरेगी बढ़ती उमर, करे जिक्र हर चौक।|

शीलहरण पे पढ़ रही, भीड़ व्याह के मन्त्र |
सहनशील-निरपेक्ष मन, जय जय जय जनतंत्र ||

अधिक आत्मविश्वास में, इस धरती के मूढ़ |
विज्ञ दिखे शंकाग्रसित, यही समस्या गूढ़ ||

सुबह-शाम सुलगा रहे, धूप-अगर-लुहबान |
मच्छर क्यों भागे नहीं, क्यों न दिखे भगवान् ||

धर्म-कर्म पर जब चढ़े, अर्थ-काम का जिन्न |
मंदिर मस्जिद में खुलें, नए प्रकल्प विभिन्न ||

धनी पकड़ ले बिस्तरा, भाग्य-विधाता क्रूर ।
ले वकील आये सगे, रखा चिकित्सक दूर।।

घूम घूम कर बेचता, ग्वाला दूध उधार।
ढूंढ ढूंढ मदिरा नगद, किनता किन्तु बिहार।।

चले शूल पर तो चुभा, जूते में बस एक।
पर उसूल पर जब चले, चुभते शूल अनेक।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

रविकर रोने के लिए, मिले न कंधा एक।
चार चार कंधे मिले, बिलखें आज अनेक।।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

पूरे होंगे किस तरह, कहो अधूरे ख्वाब।
सो जा चादर तान के, देता चतुर जवाब।।

रविकर अच्छे कर्म कर, फल की फिक्र बिसार।
आम संतरा सेब से, पटे पड़े बाजार।।

खले मुखर की वाह तब, समझदार जब मौन।
काव्य शक्ति-सम्पन्न तो, कवि को भूले कौन।।

दर्पण जैसे दोस्त की, यदि पॉलिस बदरंग।
रविकर छोड़े शर्तिया, प्रतिछाया भी संग।

लेडी-डाक्टर खोजता, पत्नी प्रसव समीप।
बुझा बहन का जो चुका, रविकर शिक्षा-दीप।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

फूँक मारके दर्द का, मैया करे इलाज।
वह तो बच्चों के लिए, वैद्यों की सरताज।

चक्षु-तराजू तौल के, भार बिना पासंग।
हल्कापन इन्सान का, देख देख हो दंग।।

चुरा सका कब नर हुनर, शहद चुराया ढेर।
मधुमक्खी निश्चिंत है, छत्ता नया उकेर।।

हर मकान में बस रहे, अब तो घर दो चार।
पके कान दीवार के, सुन सुन के तकरार।।

मेरे मोटे पेट से, रविकर-मद टकराय।
कैसे मिलता मैं गले, लौटा पीठ दिखाय।।

रिश्ते 'की मत' फ़िक्र कर, यदि कीमत मिल जाय।
पहली फुरसत में उसे, देना तुम निपटाय।।

नौ सौ चूहे खाय के, बिल्ली हज को जाय।
चौराहे पर बैठ के, गिनती बूढ़ी गाय।।

कुल के मंगलकार्य में, करे जाय तकरार।
हर्जा-खर्चा ले बचा, चालू पट्टीदार ।।

अपने मुंह मिट्ठू बनें, किन्तु चूकता ढीठ।
नहीं ठोक पाया कभी, रविकर अपनी पीठ।।

अजगर सो के साथ में, रोज नापता देह।
कर के कल उदरस्थ वह, सिद्ध करेगा नेह।।

खड्ग तीर चाकू चले, बरछी चले कटार।
कौन घाव गहरा करे, देखो ताना मार ।।

नोटों की गड्डी खरी, ले खरीद हर माल।
किन्तु भाग्य परखा गया, सिक्का एक उछाल।।

मजे मजे मजमा जमा, दफना दिया जमीर |
स्वार्थ-सिद्ध सबके हुवे, लटका दी तस्वीर ||

झूठे दो-दो चोंच कर, लड़ें चोंचलेबाज |
एक साथ फिर बैठते, करे परस्पर खाज ||

अगर वेद ना पढ़ सके, कर ले 'रविकर' जाप । 
व्यक्ति-वेदना पढ़ मगर,  हर उसका संताप ।।

बेलन ताने नारि तो, चादर तानें लोग |
ताने मारे किन्तु जब, टले  कहाँ दुर्योग ||

जाति ना पूछो साधु की, कहते राजा रंक |
मजहब भी पूछो नहीं, बढ़ने दो आतंक ||  

मयखाने में शाम को, जो कुछ आया भूल।
सुबह-सुबह पहुँचा गया, रविकर नामाकूल।।😊

घड़ियों के रिश्ते-सुई, रहें परस्पर मग्न।
घड़ी घड़ी मिलते नहीं, किन्तु सदा संलग्न।।

टेढ़ा पति सीधा हुआ, टेढ़ी रोटी गोल।।
गोल-गोल इस यंत्र का, नाम न रविकर खोल।।

रविकर जीवन-पुस्तिका, पलटे पृष्ट हजार।
वैसे के वैसे मिले, शब्द-अर्थ हर बार।।

खुद से नाड़ा बाँध ले, वो ही बाल सयान।
ढीला होने दे नहीं, वही तरुण बलवान।।

आत्म-मुग्ध विद्वान का, उस विमूढ सा हाल।
बैठ गधे पर जो चले, सिर पर उठा बवाल।।

जब #दारू हर सोच को, करे प्रकट बिंदास।

तब अपनी #दारा करे, बन्द सकल बकवास।।

30 August, 2018

दोहे

जिसपर अंधों सा किया, लगातार विश्वास।
अंधा साबित कर गया, रविकर वह सायास।।

बीज उगे बिन शोर के, तरुवर गिरे धड़ाम।
सृजन-शक्ति अक्सर सुने, विध्वंसक कुहराम।।

सत्य प्रगट कर स्वयं को, करे प्रतिष्ठित धर्म।
झूठ छुपा फिरता रहे, उद्बेधन बेशर्म।।

दो अवश्य तुम प्रति-क्रिया, दो शर्तिया जवाब।
लेकिन संयम-सभ्यता, का भी रखो हिसाब।।

चींटी से श्रम सीखिए, बगुले से तरकीब।
मकड़ी से कारीगरी, आये लक्ष्य करीब।।

कुत्ते भागे दुम दबा, जूता काटे पैर।
नमो नमो जपते रहो, अपनों से क्या बैर।।

लफ्फाजी भर जिंदगी, मक्खी भिनके आज।
धू-धू कर जलती चिता, थू-थू करे समाज।।

झड़ी लगा उपदेश की, घन-गुरु करे कमाल।
रविकर कुल्हड़-बुद्धि तो, खाये किन्तु उबाल।।

रफ़्ता रफ़्ता जिन्दगी, चली मौत की ओर।
रोओ या विहँसो-हँसो, वह तो रही अगोर।।





27 August, 2018

दोहे-

तुम तो मेरी शक्ति प्रिय, सुनती नारि दबंग।
कमजोरी है कौन फिर, कहकर छेड़ी जंग।।

आँधी पानी बर्फ से, बचा रही जो टीन।
ताना सुनती शोर का, ज्यों गार्जियन-नवीन।।

होता जब हर साधु का, रविकर एक अतीत।
तो डाकू का क्यों नहीं, हो भविष्य हे मीत।। 

परछाई से क्यों डरे, रे मानुस की जात।
वहीं कहीं है रोशनी, सुधरेंगे हालात।।

दो अवश्य तुम प्रति-क्रिया, दो शर्तिया जवाब।
लेकिन संयम-सभ्यता, का भी रखो हिसाब।।

मन का मतलब वासना, बिडम्बना जंजाल।
प्रश्न पहेली कल्पना, भूत-भविष्य बवाल।।

आत्मा भटके, तन मरे, कल-परसों की बात।
तन भटके, आत्मा मरे, रविकर आज हठात।।

कर जीवन अब चेतकर, ख्वाहिश से परहेज।
वक्त दवा हर मर्ज की, असर सनसनीखेज।।

आँधी से भी अतिविकट, रविकर क्रोध-प्रहार।
गिरे इधर दीवार तो, उठे उधर दीवार।।

किस किस के सँग सो चुकी, पति ने किया सवाल।
सोने देता कौन कब, गयी प्रश्न वह टाल😊😊

किसकिस के सँग सो चुकी, पति का प्रथम सवाल।
सोने देता कौन कब, बोली घूंघट डाल।।

चार दिनों की जिंदगी, कहने का क्या अर्थ।
जीना सीखा देर से, कर आकलन तदर्थ।

आपेक्षा यदि अत्यधिक, सके उपेक्षा तोड़।
चादर यदि जाये सिकुड़, कुढ़ मत, घुटने मोड़।।

रविकर अपनी बात पर, अड़ा रहे दिन-रात।
स्वाभिमान वह सत्य का, यूँ ही नहीं हठात।।

भलमनसाहत पर करे, जब रविकर संदेह।
रहे असर से कब बचे, देह-देहरी-गेह।।

सौ गुण पर भारी पड़े, एक अपरिचित खोट।
तंज आत्मसम्मान को, रह-रह रहा कचोट।।

मार्ग बदलने के लिए, यदि लड़की मजबूर |
कुत्ता हो या आदमी, मारो उसे जरूर ||

बुरा वक्त आता रहा, सदा वक्त-बेवक्त |
सिखा गया समझा गया, दे सन्देश सशक्त ||

रविकर बस उम्मीद का, लेता दामन थाम।
चाहत में गुजरे सुबह, पर दहशत में शाम।।

खोने की दहशत-सनक, हद पाने की चाह।
भटक रहा रविकर मनुज, मठ-मंदिर-दरगाह।।

बंद घड़ी भी दे जहाँ, सही समय दो बार।
वहाँ किसी भी वस्तु को, मत कहना बेकार।।1।।

छिद्रान्वेषी मक्खियाँ, करती मन-बहलाव।
छोड़े कंचन-वर्ण को, खोजे रिसते घाव।।2।।

बुरे वक्त में छोड़ के, गये लोग कुछ खास।
रविकर के कृतित्व पर, उनको था विश्वास।।

कुछ तो तेरे पास है, जिनसे वे महरूम।
निंदा करने दो उन्हें, तू मस्ती से घूम।।

रविकर उनके साथ है, जिनका वक्त खराब।
बुरी नीति जिनकी उन्हें, देगा वक्त जवाब।।

केवल माँ की दृष्टि में, सब विधि लायक लाल।
घर की बाकी नारियाँ, करती खड़े सवाल।।

इश्क सरिस होता नहीं, रविकर घर का काम।
दिन प्रति दिन करना पड़े, हर आराम हराम।।

बड़ी बड़ी बातें करें, मरें पसारे हाथ।
बनते तो दिलदार थे, किन्तु न देते साथ।।

बचपन की जिद यूँ बढ़ी, पचपन तक बेजार।
समझौते करने लगी, बदल गया व्यवहार।।

जुमले बाजी दे जिता, बाजी तो इक बार।
चढ़े न हाड़ी काठ की, बारम्बार बघार।।

दिल-दिमाग हर अंग पे, रविकर पड़े निशान।
कहीं छुरी बेलन कहीं, कैंची कहीं जुबान।।

सका न जब वो बिल चुका, खाय मार बेभाव।
उसी भाव पर किन्तु फिर, माँगे मटन-पुलाव।।

दिखे दिव्य दिव्यांगता, दिखते दो दो हाथ।
करती दो दो हाथ फिर, चुनौतियों के साथ।।

गुड़ खा अदा न कर सका, पड़े लात बेभाव।
इसी भाव पर ढीठ फिर, माँगे मटन-पुलाव😊

कर लेता बर्दाश्त जब, पति बेलन की मार।
पत्नी ताना मारकर, देती नशा उतार।।

अर्थ पिता से ले समझ, होता क्या संघर्ष।
संस्कार माँ दे रही, दे बलिदान सहर्ष।।

चमके सुन्दर तन मगर, काले छुद्र विचार |
स्वर्ण-पात्र में ज्यों पड़ी, कीलें कई हजार ||

सबको देता अहमियत, रविकर बारम्बार।
बुरे गये दुत्कार कर, भले करें सत्कार।।

शब्द चखो शबरी सरिस, लेकर रविकर स्वाद।
फिर परोस करके सुनो, रामनाम अनुनाद।।

सुख जोड़े दुख दे घटा, कहाँ गणित में ताब।
हर मुश्किल का हल मगर, देती सूक्ति जनाब।।

सुख जोड़े दुख दे घटा, कहाँ गणित में ताब।
है उत्तर हर प्रश्न का, कहती किन्तु जनाब।।

ईश-कथा सी जन-व्यथा, रविकर आदि न अन्त।
करते यद्यपि कोशिशें, सब जीवनपर्यन्त।।

उठे धुँआ अंतस जले, सहकर दर्द-विछोह।
लेकिन मुस्काते अधर, उस से करते द्रोह।

फँसी अधर में जिंदगी, अन्तस जलता जाय।
किन्तु अधर माने नहीं, रहे सतत मुस्काय ।

देह जलेगी शर्तिया, लेकर आधा पेड़।
एक पेड़ तो दे लगा, दे आंदोलन छेड़।।

वासुदेव की देवकी, ताके यमुना पार।
वह यसुमति के भाग्य से, गयी अन्ततः हार।।

यदि शर्मिंदा भूल पर, है कोई इन्सान।
आँसू पश्चाताप के, देते बना महान।।

मिला कदम से हर कदम, चलते मित्र अनेक।
कीचड़ किन्तु उछालते, चप्पल सम दो-एक।।

लगे गलत व्यवहार यदि, दो-दो खास उपाय ।
या तो मुँह से बोल दो, या लो कदम उठाय।।

पति पत्नी और
सम्बन्धों के मध्य में, आवश्यक विश्वास।😊
करो सुनिश्चित वो कहीं, जाय न पत्नी पास।।

गुरु-घंटाल
बुझी जिस्म की आग तो, करे रूह की बात।
प्रवचनकर्ता छद्म गुरु, मंद-मंद-मुस्कात।।

मौत
पैर न ढो सकते बदन, किन्तु न कर अफसोस।
पैदल तो जाना नही, तत्पर पास-पड़ोस ।।

जानम्
रविकर डब्बा लोन का, हो जाता है गोल।
अथवा चींटी लग गई, तेरी छुवन अमोल।।

सही
बाघ बचा, कुत्ते बचा, पशु-प्रेमी कहलाँय।
बड़े चाव से वे मगर, हर बिरयानी खाँय।।

दिल से करदी बेदखल, दिखला दी औकात।
रहता अब बोरा बिछा, धत् लैला की जात ।।

देखो पत्थर मील का, दूर हजारों मील।
उठो जगो आगे बढ़ो, मत दो रविकर ढील।।

अपनों से होना खफा, बेशक है अधिकार।
मान मनाने से मगर, यदि अपनों से प्यार।।

बड़ा वक्त से कब कहाँ, कोई भी कविराज।
कहाँ जिन्दगी सी गजब, कोई कविता आज।।

काट कबूतर शान्ति का, मिटा रहा वह खाज।
वह तो सीधा कर रहा, अपना उल्लू आज।।

कबूतरों को काटकर, अमन-चमन के गिद्ध।।
अपना उल्लू कर रहे, सीधा और समृद्ध।।

पत्नी पूछे हो कहाँ, कहे पड़ोसन पास।😊😊
वो फिर बोली 'किस'-लिए, पति बोला यस-बॉस।।

कर्तव्यों का निर्वहन, कभी न रहता याद।
पर अधिकारों के लिए, करे रोज बकवाद।।

चुनौतियों को यूँ कभी, करो न सीमित मीत।
अपितु चुनौती दो सभी, सीमाओं को जीत।।

जब घमंड हो ज्ञान का, अधिक-आत्मविश्वास।
खुद की गलती का भला, कैसे हो अहसास।।

सार्वजनिक आलोचना, मारे गहरी चोट।
दो सलाह एकांत में, है यदि रविकर खोट।

सर्वप्रथम पहचानता, चेहरा हर इंसान।
वाणी कर्म विचार से, फिर करता पहचान।।

खिला ज्ञान की गोलियाँ, करे आइ-क्यू टेस्ट।
जो भी गोली दे रहा, उसे ऑल दी बेस्ट।।

करे प्रशंसा मूर्ख जब, खूब बघारे शान।
सुनकर निंदा हो दुखी, तथाकथित विद्वान।।

वह अच्छे पल के लिए, देता खुद को श्रेय।
किन्तु बुरे पल पर कहे, राहु-केतु-शनि देय।।

कदम मिलाकर चल रहे, चप्पल सरिस अनेक।
कीचड़ किन्तु उछालते, उनमें से कुछ-एक।।

माँ ही रविकर गुरु-प्रथम, कहे मनुज-सम्भ्रान्त।
पत्नी अंतिम-गुरु मगर, कर देती दीक्षान्त।।

करे प्रशंसा मूर्ख जब, खूब बघारे शान।
सुनकर निंदा हो दुखी, तथाकथित विद्वान।।

वह अच्छे पल के लिए, देता खुद को श्रेय।
किन्तु बुरे पल पर कहे, राहु-केतु-शनि देय।।

कदम मिलाकर चल रहे, चप्पल सरिस अनेक।
कीचड़ किन्तु उछालते, उनमें से कुछ-एक।।

कई लोग चप्पल सरिस, चलते रविकर संग।
कीचड़ किन्तु उछालते, बदल बदल के रंग।।

मिला कदम से हर कदम, चप्पल करे कमाल।
चलें साथ कुछ लोग त्यों, कीचड़ किन्तु उछाल।।

माँ ही रविकर गुरु-प्रथम, कहे मनुज-सम्भ्रान्त।
पत्नी अंतिम-गुरु मगर, कर देती दीक्षान्त।।

माँ ही पहली गुरु सदा, देती ज्ञान अपार।
अंतिम गुरु बीवी मगर, महिमा अपरम्पार।।
😊
माँ ही पहली गुरु सदा, करें ज्ञान सब प्राप्त।
अंतिम गुरु बीवी मगर, शिक्षा करे समाप्त।

न्यौछावर माँ पर करे, वर्तमान जब फौज।
हो भविष्य सुखमय तभी, जन-गण-मन की मौज।

हुआ रूह से रूह का, रिश्ता आज दुरूह।
नारि-देह को नोचते, कामी दैत्य-समूह।।

जिस सुर में माँ-बाप से, बातें करते आप।
पुत्र उसी सुर का करे, नित रियाज आलाप।।

रचो पिता के साथ तुम, जिस सुलूक का काव्य।
वाचन-गायन सुत करे, वाद्य सहित सम्भाव्य।।

जो सुलूक कर बाप से, उनपर लिखे सुलेख।
वही पढ़ेगा पुत्र कल, लेना रविकर देख।।

चुनौतियां देती बना, ज्यादा जिम्मेदार।
जीवन बिन जद्दोजहद, हो निष्फल बेकार।

रचो पिता के साथ तुम, जिस सुलूक का काव्य।
वाचन-गायन सुत करे, वाद्य सहित सम्भाव्य।।

जो सुलूक कर बाप से, लिखते उनपर लेख।
वही पढ़ेगा पुत्र कल, लेना रविकर देख।।

करें याद जब हम तुम्हें, करो हमें तुम याद।
फिर भी दावा साथ का, वाह वाह उस्ताद।।

है भविष्य कपटी बड़ा, दे आश्वासन मात्र।
वर्तमान में सुख निहित, करते प्राप्त सुपात्र।।

टूटे यदि विश्वास तो, काम न आये तर्क।
विष खाओ चाहे कसम, पड़े न रविकर फर्क।।

किए-कराए पर मियाँ, झटपट पानी फेर।
आना होगा शर्तिया, कल फिर देर-सवेर।।

ग्राहक को कह देवता, देते थे सम्मान।
कल सीसीटीवी लगा, बदलें आज बयान।।

कंगारू सी मैं बनूँ, दे दो प्रभु वरदान।
ताकि फोन हो हाथ मे, थैली में सन्तान।।

परेशान किसको करूँ, ऐ दिल कुछ तो बोल।
जो सुकून से जी रहा, उसकी नब्ज टटोल।।😊

आई इतनी हिचकियाँ, निकले उनके प्राण।
उम्रकैद रविकर मिली, पुख्ता मिले प्रमाण।।

प्रभुवर अब आशीष का, बदलो यह अंदाज।
रविकर पंजा देखकर, रुँधती है आवाज।।

टूटे यदि विश्वास तो, काम न आये तर्क।
लाख कसम खा या जहर, पड़े न रविकर फर्क।।

होते कातिल भीड़ के, बीस हाथ, दस-माथ।
दिल-दिमाग रविकर मगर, कभी न देता साथ।।

अक्सर जोड़-घटाव में, हुई जिंदगी फेल।
भिन्न दशमलव शून्य का, चालू रेलमपेल।।

सोना तो कारक बड़ा, करवा सकता जंग।
जंग लड़ी जाती मगर, रविकर लोहे संग।।

है भविष्य कपटी बड़ा, दे आश्वासन मात्र।
वर्तमान में सुख निहित, कर ले प्राप्त सुपात्र।।

दाँत, खाल, दुम में जहर, जीव-जंतु के पास।
किन्तु मनुज की बात में, जादू, जहर, मिठास ।।

पूजाघर में ही नहीं, अपितु वहाँ भी वास।
करता जहाँ गुनाह के, तू षडयंत्र सयास।।

लेखक कवि की धूर्तता, रविकर बड़ी प्रसिद्ध।
अर्धसत्य में झूठ को, मिला-मिला हो वृद्ध।😊
मिला सत्य मे झूठ को, रचना करे समृद्ध।।।

चमचे तो बेहद चतुर, अरे भगोने चेत।
चिड़ियों सा वे भी उड़ें, चुगकर सारा खेत।।

प्रभुवर अब आशीष का, बदलो यह अंदाज।
रविकर पंजा देखकर, रुँधती है आवाज।।

टूटे यदि विश्वास तो, काम न आये तर्क।
लाख कसम खा या जहर, पड़े न रविकर फर्क।।

होते कातिल भीड़ के, बीस हाथ, दस-माथ।
दिल-दिमाग होता मगर, कभी न देता साथ।।

अक्सर जोड़-घटाव में, हुई जिंदगी फेल।
भिन्न दशमलव शून्य का, चालू ठेलमठेल।।

जब महत्वकांक्षा प्रबल, रविकर जाती खेप।
तब सुझाव संवाद भी, लगते हस्तक्षेप।।

रविकर तेरा नाम-यश, रहा कलेजा दाह।
लगे बुझाने आग तो, उड़े धुँआ, अफवाह।।

नगरपालिका दे गिरा, दरके हुए मकान।
अरे दिलजले मौन रह, वरना तय नुकसान।।

रविकर तेरा नाम ही, रहा कलेजा दाह।
लोग बुझाने लग पड़े, उठे धुँआ अफवाह।।

बहरों के रसपान का, बहरों को अधिकार।
जूँ रेंगेगा कान पर, श्रवण-यंत्र तो धार।।

जो तोले भर की जुबाँ, सकता नहीं सँभाल।
वो ही इज्ज़त गैर की, रह रह रहा उछाल।।

जो तोले भर की जुबाँ, सकता नहीं सँभाल।
वो ही इज्ज़त गैर की, रह रह रहा उछाल।।

इन्तजार का वक्त यह, कटे न अपने-आप।
काट कलेजे को कटे, कर्कश क्रिया-कलाप।।

भड़काऊ मैसेज पढ़े, सुने विषैले कथ्य।
झूठी टी वी की बहस, खले खोखले तथ्य ।।

पति-समूह सुंदर-सरस, ईश्वर का उपकार।
ब्यूटी-पार्लर अन्यथा, देते दुगुना भार।।

रक्तपात छक्के करें, नहला दें कश्मीर।
सत्ता दहला दे उन्हें, लौटा कर हर पीर।।

कोई भी करता नहीं, दूजे की परवाह ।
आगे वाले को गिरा, करे निरापद राह।।।

पात्र भरा-पूरा मगर, चमचा चिपका संग।
शनैः शनैः खाली करे, करे पात्र बदरंग।।1।।

खाली कर देगा तुझे, बचे न एक छटाक।
अरे भगोने चेत जा, हर चमचा चालाक।।2।।

पात्र भरा-पूरा मगर, चमचा उसके साथ।
शनैः शनैः खाली करे, रविकर ठोके माथ।।3।।***

पात्र भरा-पूरा मगर, चमचे की करतूत।
शनैः शनैः खाली करे, छोड़े नहीं सुबूत।।4।।

पात्र भरा-पूरा मगर, चमचे की करतूत।
शनैः शनैः खाली करे, बिखरे पड़े सुबूत।।5।।***

खाली कर देगा तुझे, बचे न एक छटाक।
अरे भगोने चेत जा, हर चमचा चालाक।।

चमचे तो बेहद चतुर, अरे भगोने चेत।
चिड़ियों सा वे भी उड़ें, चुगकर सारा खेत।।

चले सुनिश्चित मार्ग पर, यह जीवन कब हाय।
हाय-हाय रविकर करे, करे न किन्तु उपाय।।

है भविष्य की राह में, उत्सुकता अवरोध।
भूतकाल का हल कहाँ, अब कोई त्रुटि-बोध।

धर्मोलंघन, पर-अहित, सह के निज अपमान।
करे जमा धन, किन्तु कब, सुख पाया इंसान।।

रहा अगरबत्ती जला, लेकर तेरा नाम।
मन-पसन्द खुश्बू मगर, खुद सूँघे नितराम।।

कश्ती सम ईमान जब, डगमगाय भव बीच।
फँसे भँवर में जिन्दगी, डूबे रविकर नीच।।

गुरु बिन मिले न मोक्ष सुन, रविकर करे कमाल।
गुरु-गुरूर लेता बढ़ा, बनता गुरु-घंटाल।

कहो नहीं कठिनाइयाँ, प्रभु से सुबहो-शाम।
कठिनाई को बोल दो, रविकर सँग हैं राम।।

रुपिये-रिश्तों का रखो, रविकर भरसक ध्यान ।
इन्हें कमाना है कठिन, पर खोना आसान।।

कह रविकर निज मुश्किलें, करो न प्रभु को तंग।
अपितु मुश्किलों से कहो, प्रभु हैं मेरे संग।।

गिन-गिन गलती गैर की, त्यागे दुनिया प्राण।
जो अपनीे गलती गिने, उसका हो कल्याण।

चूड़ी जैसी जिंदगी, होती जाये तंग।
काम-क्रोध-मद-लोभ से, हुई आज बदरंग।।

बड़ा नही धन से बने, मन्सूबे मत पाल।
😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁
तेल मसाला ले नमक, दही उड़द की दाल।

चढ़ी त्याग की मूर्ति पर, स्वार्थी धूर्त चुड़ैल।
हारा बुत संघर्ष का, मूर्ति बना ली बैल।।😁😁

मित्र, सोच, पुस्तक, बही, राह, लक्ष्य, हमराह।
कर देते गुमराह जब, होती कौम तबाह।।

पैदा होते ही थमे, रविकर बढ़ती आयु।
संग-संग घटने लगे, छिति-नभ-जल-शुचि-वायु।।

शब्द-शब्द में भाव का, समावेश उत्कृष्ट |
शिल्प-सुगढ़, लयबद्ध-गति, यति रविकर सारिष्ट ||

टूटा तारा देख कर, माता के मन-प्राण |
एकमात्र वर माँगते, हो जग का कल्याण ||

पहले तो लगती भली, फिर किच-किच प्रारम्भ।
रविकर वो बरसात सी, लगी दिखाने दम्भ।।

सबसे बड़ा प्रमाद है, रविकर तेरी याद।
कई व्यसन छोटे पड़े, काम-धाम बरबाद।।

अगर शिकायत एक से, कर ले उससे बात।
किन्तू कई से है अगर, खुद से कर शुरुआत।।

ऊँचे दामों में बिका, रविकर शाश्वत् झूठ।
सत्य नहीं सम्मुख टिका, बेमतलब जग रूठ।।

सना वासना से बदन, बदबू से भर जाय।
यदि हो आत्मिक प्यार तो, दे काया महकाय।।

पैदा होते ही थमे, रविकर बढ़ती आयु।
आयु संग घटने लगे, छिति-नभ-जल-शुचि-वायु।।