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14 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-8

पूरी कथा के लिए 
पर आयें |
-- रविकर 
आश्रम की रौनक बढ़ी, सास-ससुर खुश होंय |
सृंगी अपने शोध में, रहते  हरदम खोय ||

शांता सेवा में जुटी, परम्परा निर्वाह |
करे रसोईं चौकसी, भोजन की परवाह ||

शिष्य सभी भोजन करें, पावें नित मिष्ठान |
करें परिश्रम वर्ग में, नित-प्रति बाढ़े ज्ञान ||

वर्षा-ऋतु में पूजती, कोसी को धर ध्यान |
सृन्गेश्वर की कृपा से, उपजे बढ़िया धान ||

शांता की बदली इधर, पहले वाली चाल |
धीरे धीरे पग धरे, चलती बड़ा संभाल ||

खान-पान में हो रहा, थोडा सा बदलाव |
खट्टी चीजें भा रहीं,  बदल गए अब चाव ||

सासू माँ रखने लगीं, अपनी दृष्टी तेज |
प्रफुल्लित माता रखे,  चीजें सभी सहेज ||

पुत्री सुन्दर जन्मती, बाजे आश्रम थाल |
सेवा सुश्रुषा करे, पोसे बहुत संभाल ||

तीन वर्ष पूरे हुए, शिक्षा पूरी होय |
दीदी से मिलकर चले, बटुक अंग फिर रोय || 

फिर पूरे परिवार से, करके नेक सलाह |
माँ दादी को साथ ले, पकड़ें घर की राह || 

आश्रम इक सुन्दर बना, करते हैं उपचार |
साधुवाद है वैद्य जी, बहुत बहुत आभार ||

तीन वर्ष बीते इधर, मिला राज सन्देश |
वैद्यराज का रिक्त पद, तेरे लिए विशेष ||
 
क्षमा-प्रार्थना कर बचे, नहीं छोड़ते ग्राम |
आश्रम फिर चलता रहा, प्रेम सहित अविराम ||

रक्षाबंधन पर मिली, शांता घर पर आय |
भागिनेय दो गोद में, दीदी रही खेलाय ||

पुत्तुल के संग वो रखी, पाणिग्रहण प्रस्ताव |
मेरी सहमति है सदा, पुत्तुल की बतलाव ||

शांता लेकर बटुक को, चम्पानगरी जाय |
पुत्तुल के इनकार पर, रही उसे समझाय ||
 
नश्वर जीवन कर दिया, इस शाळा के नाम |
बस नारी उत्थान हित, करना मुझको काम ||

पुष्पा से एकांत में, मिलती शांता जाय |
वैद्य बटुक से व्याह हित, मांगी उसकी राय ||

शरमाई बाहर भगी, मिला मूल संकेत |
मंदिर में शादी हुई, घरवाला अनिकेत ||

रूपा से मिलकर हुई दीदी बड़ी प्रसन्न |
गोदी में इक खेलता, दूजा है आसन्न ||

पञ्च रत्न की सब कथा, पूछी फिर चितलाय |
डरकर नकली असुर से, भाग चार जन जाँय ||

पञ्च-रतन को एक दिन, दे अभिमंत्रित धान | 
खेती करने को कहा, देकर पञ्च-स्थान ||

बढ़िया उत्पादन हुआ, मन सा निर्मल भात |
खाने में स्वादिष्टतम, हुआ न कोई घात ||


राज काज मिल देखते, पंचरत्न सह सोम |
महासचिव का साथ है, कुछ भी ना प्रतिलोम ||


पिताश्री ने एक दिन, सबको लिया बुलाय |
पंचरत्न में चाहिए, स्वामिभक्त अधिकाय ||


चाटुकारिता से बचो, इंगित करिए भूल |
राजधर्म का है यही, सबसे बड़ा उसूल ||


लेकर सेवा भावना, देखो भाग विभाग |
पैदा करने में लगो, जनमन में अनुराग ||

मात-पिता से पूछ के, कुशल क्षेम हालात |
संतुष्टि पाती वहां, शांता वापस जात ||


कुशल व्यवस्थापक बनी, हुई भगवती माय |
पाली नौ - नौ  पुत्रियाँ,  आठो  पुत्र पढाय ||


एक से बढ़कर एक थे, संतति सब गुणवान |
शोध भाष्य करते रहे, पढ़ते वेद - पुरान ||

वैज्ञानिक वे श्रेष्ठ सब, मन्त्रों पर अधिकार |
अपने अपने ढंग से, सुखी करें संसार ||


सास-ससुर सब सौंप के, गए देव अस्थान |
राजकाज सब साध के, देकर के वरदान ||

वन खंडेश्वर को गए, बिबंडक महराज |
भिंड आश्रम को सजा, करे वहां प्रभु-काज ||

आठ पौत्रों से मिले, सब है बेद-प्रवीन |
बड़े भिंड के हो गए, आश्रम में आसीन ||
 
सौंपें सारे ज्ञान को, बाबा बड़े महान |
स्वर्ग-लोक जाकर बसे, छोड़ा यह अस्थान ||

भिन्डी ऋषि के रूप में, हुए विश्व विख्यात |
सात राज्य में जा बसे, पौत्र बचे जो सात ||

एक अवध में जा बसे, सरयू तट के पास |
बरुआ सागर आ गया, एक पुत्र को रास ||

विदिशा जाकर बस गए, सबसे छोटे पूत |
पुष्कर की शोभा बढ़ी, बाढ़ा वंश अकूत ||


आगे जाकर यह हुए, छत्तीस कुल सिंगार |
छ-न्याती भाई यहाँ, अतुलनीय विस्तार ||


बसे हिमालय तलहटी, चौरासी सद्ग्राम |
वंशज सृंगी के यहाँ, रहते हैं अविराम ||

सृंगी दक्षिण में गए, पर्वत बना निवास |
ज्ञान बाँट करते रहे, रही शांता पास ||

वंश-बेल बढती रही, तरह तरह के रूप |
कहीं मनीषी बन रमे, हुए कहीं के भूप ||


मंत्रो की शक्ती प्रबल, तंत्रों पर अधिकार |
कलियुग के प्रारब्ध तक, करे वंश व्यवहार ||


हुए परीक्षित जब भ्रमित, कलियुग का संत्रास |
स्वर्ण-मुकुट में जा घुसा, करता बुद्धी नाश  ||


सरिता तट पर एक दिन, लौटे कर आखेट |
लोमस ऋषि से हो गई, भूपति की जब भेंट ||


बैठ समाधि में रहे, राजा समझा धूर्त |
मरा सर्प डाला गले, जैसे शंकर मूर्त ||

वंशज देखें सृंग के, भर अँजुरी में नीर |
मन्त्रों से लिखते भये, सात दिनों की पीर ||


यही सर्प काटे तुम्हें, दिन गिनिये अब सात |
गिरे राजसी कर्म से, सहो मृत्यु आघात ||


मन्त्रों की इस शक्ति का, था राजा को भान |
लोमस के पैरों पड़ा, वह राजा नादान ||


लेकिन भगवत-पाठ सुन, त्यागा राजा प्रान |
यह पावन चर्चित कथा, जाने सकल जहान ||


जय जय भगवती शांता परम

13 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-7 भाग-5

पञ्च-रत्न 
शादी होती सोम से, शांता का आभार |
कौला दालिम खुश हुए, पाती रूपा प्यार ||

समाचार लेते रहे, शांता सृंगी व्यस्त  |
दुरानुभूती माध्यम, सूर्यदेव जब अस्त ||

परम बटुक को मिल रहा, राजवैद्य का नेह |
साधक आयुर्वेद का, करता अर्पित देह ||

कौशल्या उत्सुक बड़ी, कन्याशाला घूम |
मन को हर्षित कर गई, बालाओं की धूम ||

गोदी की इक बालिका, आकर करे कमाल |
संस्कारित शिक्षित करे, दो सौ ललना पाल ||

हर बाला इक वंश है, फूले-फले विशाल |
होवे देवी मालिनी,  हरी भरी हर डाल ||

शाळा को हर एक वर्ष, सौ पण का अनुदान |
कौशल्या कहकर चली, बिटिया बड़ी महान ||

राम-लखन के साथ में, शांता समय बिताय |
दूल्हा-दुल्हन की डगर, हक़ से छेके जाय ||

स्वर्णाभूषण त्याग दी,  आडम्बर सब त्याग |
भौतिकता से  है  नहीं,  दीदी  को  अनुराग ||

दीदी बोली कीजिये, शर्त दूसरी पूर |
शाळा हरदिन जायगी, रूपा सखी जरूर ||

जिम्मेदारी दीजिये, खींचों नहीं लकीर  |
नारी में शक्ती बड़ी, बदल सके तक़दीर ||

कन्याएं दो सौ वहां, अभिभावक दो एक |
शाला की चिंता हरे, रूपा मेरी नेक ||

बना व्यवस्था चल पड़ी, वह शाळा की ओर |
आत्रेयी को सौंपती, पञ्च-रत्न की डोर ||

आचार्या करने लगी, प्रश्न-पत्र तैयार |
कई चरण की जाँच से, होना होगा पार ||

नियत तिथि पर आ रहे, लेकर सब उम्मीद |
कन्याशाला में टिके,  पढ़ उद्धृत-ताकीद ||

पहला दिन आराम का, हुई ना कोई जाँच |
नगर भ्रमण कोई करे, कोई पुस्तक बाँच ||

कोई बैठा बाग़ में, कोई गंगा तीर |
खेल करे मैदान में, कई सयाने वीर ||

मिताहार कोई वहां, मिताचार से प्यार |
कुछ तो भोजन भट्ट हैं, और कई लठमार ||

सूची इक जारी हुई, बाइस वापस जाव |
बाकी इक्कावन बचे, काया जाँच कराव ||

तेरह इसमें छट गए, अड़तिस गंगा तीर |
डूबी पानी में उधर, ग्यारह की तकदीर ||

सत्ताईस की लेखनी, बाइस हों उत्तीर्ण |
पाँच जनों के हो रहे, ऐसे भाग-विदीर्ण ||

राज महल में मिल गया, सबको एकल कक्ष |
अपने अपने विषय में, थे ये पूरे दक्ष ||

बाइस पहले जो छटे, शाला के प्रति द्वेष |
शिक्षा के प्रति थी नहीं, उनमें रुची विशेष ||

राजकाज के काम दो, दिए एक से जाँय |
तीन दिनों में एक को, आओ सब निपटाय ||

प्रतिवेदन प्रस्तुत करो, लिखकर वापस आय |
एक परीक्षा बचेगी, तेरह  को  बिलगाय ||

गुप्तचरों की सूचना, वा प्रस्तुत आलेख |
महामंत्री ने चुने, प्रतिभागी नौ  देख ||

अगले दिन दरबार में, बैठे अंग नरेश |
नौ के नौ आयें वहां, धर दरबारी भेष ||

साहस संयम शिष्टता, अनुकम्पा औदार्य |
मितव्ययी निर्बोधता, न्याय-पूर्ण सद्कार्य ||

क्षमाशीलता सादगी, सहिष्णुता गंभीर |
सच्चाई प्रफुल्लता, निष्कपटी मन धीर ||

स्वस्ती मेधा शुद्धता, हो चारित्रिक ऐक्य |
दानशीलता आस्तिक, अग्र-विचारी शैक्य ||

सर्वगुणी सब विधि भले, सब के सब उत्कृष्ट |
अंगदेश को गर्व है, गर्व करे यह सृष्ट ||

जाँच-परखकर कर रहे, सबको यहाँ नियुक्त |
एक वर्ष के बाद में, होंय चार जन मुक्त ||

तीन मास बीते यहाँ, आया फिर वैशाख |
शांता सृन्गेश्वर चली, मन में धीरज राख ||

कन्याओं से मिल लिया, पुष्पा-पुत्तुल पास |
रमणी को देकर चली, एक हिदायत ख़ास ||

 बटुक रमण फिर से चला, दीदी को ले साथ |
शिक्षा विधिवत फिर करे, जय हो भोले नाथ ||

12 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-7 भाग-4

चंपा-सोम
कई दिनों का सफ़र था, आये चंपा द्वार |
नाविक के विश्राम का, बटुक उठाये भार ||

राज महल शांता गई, माता ली लिपटाय |
मस्तक चूमी प्यार से, लेती रही बलाय ||

गई पिता के पास फिर, पिता रहे हरसाय |
स्वस्थ पिता को देखकर,फूली नहीं समाय ||

क्षण भर फिर विश्राम कर, गई सोम के कक्ष |
रूपा पर मिलती वहाँ, धक्-धक् करता वक्ष ||

गले सहेली मिल रही, पर आँखों में चोर |
सोम हमारे हैं कहाँ, अचरज होता  घोर ||

किन्तु सोम आये नहीं, की परतीक्षा खूब |
शांता शाळा को चलीं, सह रूपा के ऊब ||

शाला में स्वागत हुआ, मन प्रफुल्लित होय |
अपनी कृति को देखकर, जैसे साधक सोय ||

आत्रेयी आचार्या, गले लगाती आय |
बाला सब संकोच से, खुद को रहीं छुपाय ||

नव कन्याएं देखतीं, कौतूहल वश खूब |
सन्यासिन के वेश में, पूरी जाती ड़ूब ||

आनन्-फानन में जमे, सब उपवन में आय |
होती संध्या वंदना, रूपा कह समझाय ||

परिचय देवी का दिया, दिया ज्ञान का बार |
महाविकट दुर्भिक्ष से,  सबको  गई उबार || 

यह है अपनी शांता,  इनका  आशीर्वाद |
कन्या शाला चल पड़ी, गूंजा शुभ अनुनाद ||

पुत्तुल-पुष्पा थीं बनी, तीन वर्ष में मित्र |
मात-पिता के शोक में, स्थिति बड़ी विचित्र ||

कौला-सौजा राखती, कन्याओं का ध्यान |
पाक-कला सिखला रहीं, भाँति-भाँति पकवान ||

दोनों बालाएं मिलीं, शांता ले लिपटाय |
आंसू पोंछे प्रेम से, रही शीश सहलाय ||

क्रीडा कक्षा का समय, बाला खेलें खेल |
घोड़ा आया सोम का, रूपा मिले अकेल ||

शांता को देखा वहां, आया झट से सोम |
छूता दीदी के चरण , दिल से कहता ॐ ||

चेहरे की गंभीरता,  देती इक सन्देश |
हलके में मत लीजिये, हैं ये चीज विशेष ||

दीदी अब घर को चलो, माता रही बुलाय |
कई लोग बैठे वहाँ,  काका  काकी आय ||

सौजा कौला मिल रहीं, रमणी है बेचैन |
दालिम काका भी मिले, आधी बीती रैन ||

नाव गाँव का कह रही, वो सारा वृतांत |
सौजा पूंछी बहुत कुछ, दालिम दीखे शांत ||
 
पर मन में हलचल मची, जन्मभूमि का प्यार |
 शाबाशी पाता बटुक, किया ग्राम उद्धार ||

रमणी से मिलकर करे, शांता बातें गूढ़ |
रूपा तो हुशियार है, बना सके के मूढ़ ||

अगले दिन रूपा करे, बैठी साज सिंगार |
जाने को उद्दत दिखे, बाहर राजकुमार ||

शांता आकर बैठती, करे ठिठोली लाग |
सखी हमारी जा रही, कहाँ लगाने आग ||

सुन्दरता को न लगे, बहना कोई दाग |
अपनी रक्षा खुद करे, रखे नियंत्रित राग ||

रूपा को न सोहता, असमय यह उपदेश |
आया अंग नरेश का, इतने में सन्देश ||

रूपा को वो छोड़कर, गई पिता के पास |
चिंतित थोडा दीखते, चेहरा तनिक उदास ||

करें शिकायत सोम की, चंचलता इक दोष |
राज काज हित चाहिए, सदा सर्वदा होश ||

आयु मेरी बढ़ रही, शिथिल हो रहे अंग |
किन्तु सोम न सीखता, राज काज के ढंग ||

उडती-उडती इक खबर, करती है हैरान |
रूपा का सौन्दर्य ही, खड़े करे व्यवधान ||

हुआ राजमद सोम को, करना चाहे द्रोह |
रूपा मम पुत्री सरिस, रोकूँ कस अवरोह ||

तानाशाही सोम की, चलती अब तो खूब |
राजपुरुष जब निरंकुश, देश जाय तब डूब ||

मंत्री-परिषद् में अगर, रहें गुणी विद्वान |
राजा पर अंकुश रहे,  नहीं बने शैतान ||

पञ्च रतन का हो गठन, वही उठाये भार | 
करें सोम की वे मदद, करके उचित विचार ||

शांता कहती पिता से, दीजे उत्तर तात |
दे सकते क्या सोम को, रूपा का सौगात ||

करिए इनके व्याह फिर, चुनिए मंत्री पाँच |
महासचिव की आन पे, ना आवे पर आँच ||

सहमति में जैसे हिला, महाराज का शीश |
शांता की कम हो गयी, रूपा के प्रति रीस ||

तुरत बुलाया भूप ने,  आया जल्दी सोम |
दीदी पर पढ़ते नजर, रोमांचित से रोम ||

डुग्गी सारे देश में, एक बार बज जाय |
पांच रत्न चुनने हमें, कसके ठोक बजाय ||

राज कुंवर लेने लगे, जैसे लम्बी सांस |
दीदी की आई नहीं, अगली बातें रास ||

एक पाख में कर रहे, हम सब तेरा व्याह |
कह सकते हो है अगर, कोई अपनी चाह ||

पिता श्री क्यों कर रहे, इतनी जल्दी लग्न |
फिर रूपा के ख्याल में, हुआ अकेला मग्न ||

शुरू हुई तैयारियां, दालिम खुब हरसाय |
नेह निमंत्रण भेजते, सबको रहे बुलाय ||

रूपा तो घर में रहे, सोम उधर घबरात |
नींद गई चैना गया, रह रहकर अकुलात ||

शादी के दो  दिन बचे, आये अवध-भुवाल |
कौशल्या के साथ में, राम लखन दोउ लाल ||

सृंगी तो आये नहीं, पहुंचे पर ऋषिराज |
पूर्ण कुशलता से हुआ, शादी का आगाज ||

जब हद से करने लगा, दर्द सोम का पार |
दीदी से जाकर मिला, विनती करे हजार ||
 
दीदी कहती सोम से, सुन ले मेरी बात |
शर्त दूसरी पूर कर, करे व्यर्थ संताप ||

कौशल्या के पास फिर, गया सोम उस रात |
माता देखे  व्यग्रता, मन ही मन मुस्कात ||

जो मुश्किल में रख सके, मन में अपने धीर |
वही सोच सकता तनय, इक सच्ची तदवीर ||

कौला के जाकर छुओ, सादर दोनों पैर |
ध्यान रहे पर बात यह, जाओ मुकुट बगैर ||
 
उद्दत जैसे ही हुआ, झुका सामने सोम |
कौला पीछे हट गई, जैसे गिरता व्योम ||

अवधपुरी की रीत है, पूजुंगी कल पांव |
छूकर मेरे पैर को,  काहे पाप चढ़ाव ||

कन्याएं देवी सरिस, और जमाता मान |
पैर पूंज दे व्याह में, माता कन्यादान ||

हर्षित होकर के भगा, सीधे दीदी पास |
जैसे खोकर आ रहा, अपने होश-हवाश ||
 
दीदी के छूकर चरण, घुसता अपने कक्ष |
हर्षित होकर नाचता, जाना कन्या पक्ष ||

बहन-नारि-गुरु-सखी बन, करे पूर्ण सद्कर्म |
भाव समर्पण का सदा, बनता जीवन-धर्म ||

रानी सन्यासिन बने, दासी राजकुमारि |
जीती हर किरदार खुश, नारी विगत बिसारि ||

नारी सबल समर्थ है, कितने बदले रूप |
सामन्जस बैठाय ले, लगे छांह या धूप ||

शारीरिक शक्ति तनिक, नारी नर से क्षीन |
अंतर-मन मजबूत तन, सहनशक्ति परवीन ||

10 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-7 भाग-3

हरी भरी यह उर्वरा, गंगा का वरदान |
प्रभु की भक्ती से भरा, है चौरस मैदान ||

गंगा जी में मिल रहीं, छोटी नदियाँ आय |
यमुना आई दूर से, देख गंग हरषाय ||

सरस्वती भी हैं यहाँ, त्रिवेणी का धाम |
सुन्दर होती आरती, मुग्ध कर रही शाम ||

संगम पहली मर्तवा, देख प्रफुल्लित होय |
करती संध्या वंदना, अपना बदन भिगोय ||

रात यहीं विश्राम कर, सुबह बढ़ाई नाव |
काशी में दर्शन करे, तन-मन भक्ति-भाव ||

बाढ़ी गंगा जी गजब, थी अथाह जलरास |
नाव चलाने में मगर, बड़े कुशल सब  दास ||

धीरे धीरे हो गया, सरयू संगम पार |
गंगा जी के पाट का, बढ़ा और विस्तार ||

आश्विन में बूंदें पड़े, रात्री बाढ़े शीत |
नाविक आगे बढ़ रहे, गाते मीठे गीत ||

ना जाने कब नींद ने, लिया उन्हें भी घेर |
बालू भित्ती में फंसे,  होने लगी कुबेर ||

दोपहर भी बीती वहां, लागे नाहीं दांव |
हिकमत करके हारते, कैसे निकले नाँव ||

टकराने से खुल गया, महत्वपूर्ण इक जोड़ |
पानी अन्दर घुस रहा, उलचें बाहें मोड़ ||

पीछे से आती दिखी, एक बड़ी सी नाव |
मदद मांगते मित्रवर, तट पर नाव कराव ||

पूछतांछ करते पता, एक कोस पर गाँव |
यथाशीघ्र जाओ वहाँ, कारीगर ले आव ||

इक नाविक के संग में, परम बटुक अगवान |
शांता देती एक पण, लाने को सामान ||

दोनों तेजी से गए, गई घरी इक बीत |
दो ही आते दीखते, बदल गई क्या रीत ||

मानव मानव की करे, मदद सदा हरसाय | 
मीठी बोली पर सखे, माटी मोल बिकाय ||

चले मरम्मत बिन नहीं, आगे मेरी नाव |
शांता बोली नाविकों,  तम्बू चलो लगाव ||

आगंतुक को देखकर, शांता है हैरान |
परम बटुक उनमें नहीं, लगे निकलने प्रान ||

नाविक बोला माँ सुनों, भाई बड़ा महान |
महारुजा से ले बचा, तीन जनों की जान ||

घोर संक्रमण से ग्रसित, हुवे गाँव के लोग |
बदन तपे खुब ज्वर चढ़े, जाने कैसा रोग ||

कारीगर चरणन पड़ा, बचा लेव मम ग्राम |
शांता देकर सांत्वना, बोले भज हरिनाम ||

चार घरी में कर दिया, पूर्ण मरम्मत काम |
हाथ जोड़कर बोलता, रात करें विश्राम ||

अगले दिन प्रात: वहाँ, तट पर आये लोग |
गन्ना गुड़ चूड़ा चढ़ा, चढ़ा रहे सब भोग ||

साध्वी शांता के छुवें, आदर से सब पाँव |
एक वृद्ध से जब सुनी, गाँव सुपरिचित नाँव ||


क्या दालिम को जानते, वही रमण के भाय |
अंगदेश जाकर बसे, महाराज ले जाय ||


जय हो देवी शांता, करय लगे जयकार |
दालिम का ही पूत है, करे वहाँ उपचार ||

और दुपहरी में दिखा, बटुक तनिक घबरात |
शांता को खुश देखकर, फिर थोडा मुस्कात ||

पीड़ा सहकर भी करो, दूजे का कल्याण |
यही चिकित्सक कर्म है, मत जाने दो प्राण ||

बटुक परम ज्यों जानता, यह बाबा का ग्राम |
बड़े बुजुर्गों को करे, छूकर पैर प्रणाम ||

औषधि सबको दी बता, दिया सफाई सीख |
मुखिया को समझा दिया, ग्राम आश्वस्त दीख ||

विदा विदाई हो गई, चली दुबारा नाव |
पाल ठीक से बाँध के, थोड़ी गति बढ़ाव ||

इक पण तुमको था दिया, कहाँ गए तुम भूल |
परम बिचारा कर रहा, अपनी भूल कुबूल ||

वापस पण करने लगा, शांता दी मुसकाय |
भाई रख ले पास में,  काम समय पर आय ||

बटुक कहे दीदी रखो, मुझे पड़े न काम |
मैं तो हूँ शिक्षार्थी, भिक्षाटन हरिनाम ||

जब नाविक को चढ़ गया, रात्री अतिशय ताप |
जड़ी बटुक की कर गई, कम उसका संताप ||

पानी  ढोने का  करे,  जो बन्दा  व्यापार  |
मुई प्यास कैसे भला, सकती उसको मार ||


लहरों के संग खेलना, लहरें जीवन देत |
लहरें ही हैं  जिंदगी, यही बैल हल खेत ||


गंगा उत्तरवाहिनी, बना है सुन्दर घाट |
नाव किनारे पर लगा, घूमी शांता हाट ||

परम बटुक करने लगे, राजनीति पर बात |
कितना होना चाहिए, कर का सद-अनुपात ||

उत्तरदायी राज्य-प्रति, या राजा प्रति होय |
मंत्री का क्या कार्य है, कहिये दीदी सोय ||

विधिसम्मत कैसे रहे, होय न्याय का राज |
राज-पुरुष के दोष पर, उठे कहाँ आवाज ||

प्रमुख विराजें ग्राम में, अंकुश का क्या रूप |
जन कल्याणी कार्य के, कैसे होंय स्वरूप ||

लम्बी चर्चा हो रही, विद्वानों की राय |
राज पक्ष प्रस्तुत करे, दीदी दे समझाय ||

09 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-7

भाग-2 
दो दिन का करके सफ़र, पहुंची कोसी तीर |
आश्रम में स्वागत हुआ, मिटी पंथ की पीर ||

अगला दिन अति व्यस्त था, अति-प्रात: उठ जाय |
आज्ञा लेकर सास की, नित्य कर्म निबटाय ||

कोशी की पूजा करे, कुलदेवी के बाद  |
सृन्गेश्वर को पूजती, मन में अति-अह्लाद ||

सास ससुर के चरण छू, बना रही पकवान |
आश्रम के सब जन बने, शांता के मेहमान ||

बड़ी रसोई में जले, चूल्हे पूरे सात |
दही बड़े जुरिया बनी,  उरद-दाल सह भात ||

आलू-गोभी की पकी, सब्जी भी रसदार |
मेवे वाली खीर से, छाई वहाँ बहार ||

दस पंगत लम्बी लगी, कुल्हड़ पत्तल साज |
भोजन लगी परोसने, अन्नपूर्णा आज ||

परम बटुक संग में लगा, रिस्य सृंग पद भूल |
अतिथि हमारे देवता, सबको किया क़ुबूल ||

परम बटुक से खुश सभी, शारद सदा सहाय |
एक बार के पाठ से, गूढ़ विषय आ जाय ||

पढ़े चिकित्सा शास्त्र वो, विषय बहुत ही गूढ़ ||
परंपरा के ज्ञान पर,  होकर के आरूढ़ ||

मन मानव कल्याण में, धन दौलत को भूल |
दीन-दुखी बीमार की, सेवा बने उसूल ||

नए शोध पर रख रहा, अपनी तीक्ष्ण निगाह |
कम कैसे हो सकेगी, अति-दर्दीली आह|

दीदी की ससुराल में, बनकर सच्चा भाय |
सेवा सुश्रुषा करे, गुरुकुल को महकाय ||

दूर-दूर से आ रहे,  याचक-दाता द्वार |
रोगी भी करवा रहे, आश्रम में उपचार ||

कुछ प्रतिनिधि विनती करें, कृपा कीजिये नाथ |
घाटी की बिगड़ी दशा, नहीं सूझता  पाथ ||
 
देव हिमाचल भूमि में, बिगढ़ रहे हालात  |
वर्षा ऋतु आधी गई, हुई नहीं बरसात ||

खाने के लाले पड़े, नंगे होंय पहाड़ |
हिंसक जीवों की वहाँ, गूंजे लगी दहाड़ ||

देव मनुज गन्धर्व सब, ऋषिवर परजा तोर |
घाटी की विपदा हरो, जन जन रहा अगोर ||

 ऋषी बिबंडक ने कहा, रखिये मन में धीर |
 जल्दी ही मिट जाएगी, यह त्रिशुच की पीर ||

सृंगी से कहने लगे, हुआ पूर इक साल |
शांता को भिजवाइए, अब अपनी ससुराल ||
 
कार्य यहाँ के पूर्ण कर, करिए अब प्रस्थान |
बड़ी समस्या का करें, समुचित शीघ्र निदान ||

हाथ जोड़कर बोलते, सृंगी मन की बात |
सहमत ऋषिवर हो गए, बतिया बड़ी सुहात ||

जाय संभालो राज को, शांता को ले जाव |
पड़े  रास्ते  में  अवध, भाई से मिलवाव ||

मात पिता के चरण छू, परम बटुक ले साथ |
रामचंद्र  को  भेंटते , देव भूमि के पाथ ||

चरण छुवे भ्राता सभी, पाते आशीर्वाद |
शांता को आते रहे,  पूरे  रस्ते  याद ||

दशरथ, तीनों रानियाँ, आवभगत में लाग |
इन अभिनव मेहमान से, भाग अवध के जाग ||

सारी परजा आ गई, करती जय जयकार |
उपहारों का लग गया, बहुत बड़ा अम्बार ||

सृंगी शांता बोलते, हम सन्यासी लोग |
चीजें संचय न करें, करे नहीं अति भोग ||

कृपा करके दीजिये, अनुमति हे श्रीमान |
ढूंढ़ जरूरतमंद को, बांटो यह सामान ||

कौशल्या मानी नहीं, मेवा फल मिष्ठान |
दो दिन खातिर संग में, बाँधीं कुछ पकवान || 

पलकों पर बैठा रहे, देवभूमि के लोग |
भीगी आँखें बरसती, वर्षा का संयोग ||

राजकाज में जा फंसे, रिस्य सृंग महराज |
प्रमुख सभी आने लगे, प्रेम-पालकी साज ||

कर सबको आश्वस्त तब, रिस्य रिसर्चर राज |
कर्म गूढ़ करने लगे, सिरमौरी को साज ||

रिस्य गुफा में कर रहे, बैठ लोक-कल्यान |
बटुक परम चढ़ता रहा, शिक्षा के सोपान ||  

उधर अंग में मच रहा, उथल-पुथल गंभीर |
रूपा को लग ही गए,  कामदेव के तीर ||

अंगराज अब स्वस्थ हैं, महामंत्री  संग |
मुश्किल हल करते रहे, प्रगति-पंथ पर अंग ||

शाला में बाला बढीं, नया भवन बनवाय |
आचार्या बारह नई, माली श्रमिक बुलाय ||

इंतजाम उत्तम किया, फैले यश चहुँ ओर |
पुंड्रा बंग विदेह जन, शाला रहे अगोर ||

परिवर्तन आया सुखद, आगे बढ़ता अंग |
नीति-नियम से चल रही, शाला नूतन ढंग ||

सोम सदा आता रहा,  कन्या-शाला पास |
रूपा से करता रहे, बातें चुप-चुप ख़ास ||

राजमहल जाने लगी, रूपा भी  दो बार |
गंगा तट पर विचरती, आई नई बहार ||

सोम फ़िदा उसपर हुए, मीठीं बातें बोल |
रूपा के तनबदन में, रहे  प्रेम-रस घोल ||

रूपा को व्याकुल करे, शांता केर विछोह |
भटके मन हो बावली, होय सोम से मोह ||

तरुण सोम चंचलमना, चल शाळा की ओर |
मानो कोई खींचता,  कठपुतली की डोर ||
 
शांता नित करती रही, कन्या-शाळा याद |
प्राकृति पहुंचाई वहाँ, रूपा का उन्माद  ||

अनमयस्क सी शांता, रहने लगी उदास |
कार्य सिद्ध करके ऋषी, लौटे शांता पास ||

बारिस की बूंदें गिरीं, बीत रहा इक माह |
मैके जाना चाहिए, शांता करे सलाह || 

फेरे की इक रस्म है, करिए उसको पूर |
नदी मार्ग से जाइए, अंगदेश अति दूर ||

हुई पालकी में विदा, ऊँचीं नीची राह |
धीरे-धीरे छूटते, गिरी कन्दरा गाह ||


तेज धार धीमी हुई, आया सम मैदान |
नाविक गण फिर थामते, यात्रा केर कमान ||
 
निश्चित तिथि पर चल पड़ी, परम बटुक के साथ |
नाव सजा के बैठती, गंगा जल ले माथ ||

06 December, 2011

भगवती शांता परम सर्ग-7 ( कथा -सार )

अंग-अवध छूटे सभी, सृंगी के संग सैर |
शांता साध्वी सी बनी, चाहे सबकी खैर ||

 कौला मुश्किल से सहे, हुई शांता गैर |
खट्टे-मिट्ठे दृश्य सब, गए आँख में तैर ||
  चौपाई 
रावण की दारुण अय्यारी | कौशल्या पर पड़ती भारी ||
कौशल्या का हरण कराये | पेटी में धर नदी बहाए ||

दशरथ संग जटायू धाये | सागर तट पर पेटी पाए ||
नारायण जप नारद आये | कौशल्या संग व्याह कराये ||

अवध नगर में खुशियाँ छाये | खर-दूषण योजना बनाये |
कौशल्या का गर्भ गिराया | पल-पल रावण रचता माया ||

सुग्गासुर आया इक पापी | गिद्धराज ने गर्दन नापी ||
नव-दुर्गा में खीर जिमाये |  नन्हीं-मुन्हीं कन्या आये ||

रानी फिर से गर्भ धारती | कौला विपदा विकट टारती ||
कौशल्या का छद्म वेश धर | सात मास मैके में जाकर ||

रावण के षड्यंत्र काटती | कौशल्या को ख़ुशी बांटती ||
शांता खुशियाँ लेकर आये | कौला को भी पास बुलाये ||

खुशियों पर ग्रहण लग जाता | शांता का इक पैर पिराता ||
नीमसार में सारे आते | दूर-दूर से वैद्य बुलाते ||

दशरथ कौशल्या सम गोती | गोतज से बीमारी होती ||
कन्या को अब गोद दीजिये | औषधि का नित लेप कीजिये ||

अंगदेश के राजा आते | शांता को गोदी में पाते ||
चम्पारानी खुब हरसाती | सूनी बगिया खिल-खिल जाती ||

दशरथ सुन्दर नाव सजाते | दास दासियाँ भी भिजवाते ||
कौला बच्ची को बहलाती | रस्ते में दालिम को पाती ||

दालिम सौजा का सौतेला | लड़े बाघ से निपट अकेला ||
 उससे भाई एक बचाए |  एक पूत को बाघ मिटाए ||


राजा देता नगर निकाला | किन्तु स्वयं ही उसे संभाला ||
शांता का रक्षक बन जाता | किस्मत पर अपनी मुस्काता ||


शांता अंगदेश आ जाती | कौला औषधि रोज लगाती ||
नामकरण में दशरथ आये | शांता पहला कदम बढाए ||

चम्पारानी गोद खिलाती | पुत्र सोम प्यारा सा पाती ||
कौला भी बन जाती माता | रूपा और बटुक का नाता ||

शांता से ज्यादा गहराता | बटुक पास में उसके जाता ||
गुरुकुल पढ़ने सोम जा रहे | नियमित घर आचार्य आ रहे || 

शांता को वे रोज पढ़ाते | रूपा और बटुक भी जाते ||
आठ साल में पूरी शिक्षा | शांता करती पास परीक्षा ||

वन विहार को शांता जाती | यहाँ किसी को नहीं बताती ||
रूपा और बटुक भी जाए | काका अपनी जान लड़ाए ||

मिली ताड़का घेरी काका | काका बोला भाग तडाका ||
जान बची तो लाख उपाया | कई दिनों में काका आया ||

सृन्गेश्वर में सृंगी मिलते | दोनों के मन-हृदय पिघलते ||
शोध पे  लम्बी चर्चा होती | पुत्रकाम का सूत्र पिरोती ||

दशरथ यग्य कराते द्वारे | चार पुत्र पा जाते प्यारे ||
पड़े मुसीबत राम सहारा | भरत लखन शत्रुघ्न  दुलारा || 

शांता की जागी इक इच्छा | शुरू कराऊं नारी शिक्षा ||
कौशल्या शाला वह खोले | आचार्या बाला की हो ले ||

सूखा और अकाल अंग में | मरते जैसे लोग जंग में ||
पूरे साल सूखती धरती | शांता जन-जन के दुःख हरती ||

दोहे 
रो-गाकर करते विदा, छूटा फिर से देस |
किस्मत में उसके लिखा, बार बार परदेस ||

सभी हितैषी छूटते, रिश्ते बने नवीन |
परम बटुक ही है यहाँ, शिक्षा में लवलीन ||

पेटी इक श्रृंगार की,  संग में मंगल-हार |
इक माला रुद्राक्ष की, सृंगी  का उपहार ||

प्रियवर मैं समझी नहीं, भेजा जो रुद्राक्ष |
धारण करने से कहीं, काक होय ताम्राक्ष ||

समझे बिन कैसे धरी, फिर सन्यासिन रूप |
सुख सुविधा सारी तजी, त्याग भूप का कूप ||

निश्छल शांता की हँसी, लेती तब मन -मोह |
प्रतिदिन उनकी प्रीत है,  करती सद-आरोह ||

शाळा को अर्पित किया, सारा मंगल कोष |
मंगल-मंगल हो रहा, मंगलमय संतोष ||

 कन्या हर परिवेश में, पाए शिक्षा दान |
शिक्षित माता दे बना, सचमुच देश महान ||

आधी आबादी अगर, पाए न अधिकार |
सारे शासक-वर्ग को, है सौ-सौ धिक्कार ||

मैंने भेजा धान जब, हमको था यह भान |
रिस्य बूझ लेंगे तुरत,  देंय उचित अस्थान ||  

एक कदम आगे बढे, करवाया एहसास |
चार क्यारियों से किया, मात-पिता के पास ||