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02 December, 2013

जुवेनाइल ऐक्ट, दुबारा देखो-भालो

(१)
खोल खाल दे बाल खलु, करता काम बलात |
नाबालिग को जेल की, महज आठ सौ रात |

महज आठ सौ रात, बाल की खाल निकालो |
जुवेनाइल ऐक्ट, दुबारा देखो-भालो |

किया अगर दुष्कर्म, सजा *दुर्विषही भाखो |
करिये नहीं अधर्म, जेल यूँ क्यूँकर राखो ||

* बड़ी कठिनाई से सहने योग्य -

MONDAY, 22 APRIL 2013

कमतर कमकस कमिश्नर, नर-नीरज पर दाग । 
कफ़नखसोटी में लगा, लगा रहा फिर आग । 
लगा रहा फिर आग, कमीना बना कमेला । 
संभले नहीं कमान, लाज से करता खेला । 
गृहमंत्रालय ढीठ, राज्य की हालत बदतर । 
करे आंकड़े पेश,  बताये दिल्ली कमतर ॥ 
कमकस=कामचोर 
कमेला = कत्लगाह (पशुओं का )

छली जा रहीं नारियां, गली-गली में द्रोह ।
नष्ट पुरुष से हो चुका, नारिजगत का मोह |

नारिजगत का मोह, गोह सम नरपशु गोहन ।
बनके गौं के यार, गोरि-गति गोही दोहन ।

नरदारा नरभूमि, नराधम हरकत छिछली । 
फेंके फ़न्दे-फाँस , फँसाये फुदकी मछली । ।  
गोहन = साथी-संगी 
गौं के यार=अपना अर्थ साधने वाला
गोही = गुप्त  
नरदारा=नपुंसक 
नरभूमि=भारतवर्ष 
फुदकी=छोटी चिड़िया
धाता कामी कापुरुष, रौंदे बेबस नार । 
बरबस बस पर चढ़ हवस, करे जुल्म-संहार । 

करे जुल्म-संहार, नहीं मिल रही सुरक्षा । 
गली हाट घर द्वार, सुरक्षित कितनी कक्षा ।  
 
करो हिफाजत स्वयं,  कुअवसर असमय आता । 
हुआ विधाता बाम, पुरुष जो बना बिधाता ॥ 





 भड़की भारी भीड़ फिर, कब तक सहे अधर्म । 
घायल करता मर्म को, प्रतिदिन का दुष्कर्म ।
प्रतिदिन का दुष्कर्म, पेट गुडिया का फाड़े । 
दहले दिल्ली देश, दरिंदा दुष्ट दहाड़े । 
नहीं सुरक्षित दीख, देश की दिल्ली लड़की । 
माँ बेटी असहाय, पुन: चिंगारी भड़की ॥ 


छद्म वेश धर दुष्टता, पाए क्योंकर ठौर । 
 बोझिल है वातावरण , जहर बुझा नव-दौर ।  
जहर बुझा नव-दौर, गौर से दुष्ट परखिये । 
भरे पड़े हैवान, सुरक्षित बच्चे रखिये । 
दादा दादी चेत, पुन: ले जिम्मा रविकर ।  
 विश्वासी आश्वस्त, लूटते छद्म वेश धर ॥ 




दाग लगाए दुष्टता,  पर दिल्ली दिलदार ।
 शील-भंग दुष्कर्म पर,  चुप शीला-सरकार
 । 

चुप शीला-सरकार, मिनिस्टर सन्न सुशीला । 
दारुण-लीला होय, नारि की अस्मत लीला ।  
नीति-नियम कानून, व्यवस्था से भर पाए । 
पुलिस दाग के तोप, दाग पर दाग लगाए ॥ 


दिल्ली में पर्यटन का, करना है विस्तार । 
टैग लगी लाइन मिली, लिख दिल्ली दिलदार । 
लिख दिल्ली दिलदार, छुपा इतिहास अनोखा । 
किन्तु रहो हुशियार, यहाँ पग पग पर धोखा । 
लूट क़त्ल दुष्कर्म, ठोकते मुजरिम किल्ली । 
रख ताबूत तयार, रिझाए दुनिया दिल्ली ॥ 

कथा भागवत की ख़तम, देह देश को दान ।
रखिये अब तलवार भी, खाली खाली म्यान ।
खाली खाली म्यान, आग तन-बदन लगाए ।
गाड़ी यह मॉडर्न, बिना ब्रेक सरपट जाए ।
झटके खाए सोच, चाल है दकियानूसी ।
अपनी रक्षा स्वयं, करो मत काना-फूसी ।।

मोमेंटम में तन-बदन, पश्चिम का आवेग ।
 सोच रखी पर ताख पर, काट रही कटु तेग ।
काट रही कटु तेग, पुरातन-वादी भारत ।
रहा अभी भी रेंग, रेस नित खुद से हारत ।
ब्रह्मचर्य का ढोंग, आस्था का रख टम-टम ।

पश्चिम का आवेग, सोच को दे मोमेंटम।

सत्य सर्वथा तथ्य यह, रोज रोज की मौत |
जीवन को करती कठिन, बेमतलब में न्यौत |
बेमतलब में न्यौत , एक दिन तो आना है |
फिर इसका क्या खौफ, निर्भया मुस्काना है |
कर के जग चैतन्य, सिखा के जीवन-अर्था |
मरने से नहीं डरे, कहे वह सत्य सर्वथा ||

लेख लिखाते ढेर से, पढ़िए सहज उपाय ।
रेप केस में सेक्स ही, पूरा बदला जाय ।
पूरा बदला जाय, भ्रूण हत्या से बचकर ।
भेदभाव से उबर, करे सर्विस जब पढ़कर ।
दुर्जन से घबराय, छोड़ दिल्ली जो जाते ।
भरपाई हो मित्र, रहो फिर लेख लिखाते ।।

इक नारी को घेर लें, दानव दुष्ट विचार ।
 शक्ति पुरुष की जो बढ़ी, अंड-बंड व्यवहार ।
अंड-बंड व्यवहार, करें संकल्प नारियां ।
होय पुरुष का जन्म, हाथ पर चला आरियाँ ।
काट रखे इक हाथ, बने नहिं अत्याचारी ।
कर पाए ना घात,  पड़े भारी इक नारी ।।

पुत्रों पर दिखला रहीं, माताएं जब लाड़ |
पुत्री पर प्रतिबन्ध क्यों, करती हो खिलवाड़ |   
करती हो खिलवाड़, हमें है सोच बदलनी | 
भेदभाव यह छोड़, पुत्र सम पुत्री करनी | 
होकर के गंभीर, ध्यान देना है मित्रों |   
अपनी चाल सुधार, बाप बनना है पुत्रों |
आशा मिलती राम में, नर नारी संजोग |
आये आसाराम से, जाने कितने लोग |
जाने कितने लोग, भोग की गलत व्याख्या |
नित आडम्बर ढोंग, बड़ी भारी है संख्या |
नारी नहिं गलनीय, नहीं वह मीठ बताशा |
सुता सृष्टि माँ बहन, सदा दुनिया की आशा ||

छी छी छी दारुण वचन, दारू पीकर संत ।
बार बार बकवास कर, करते पाप अनंत ।
करते पाप अनंत, कथा जीवन पर्यन्तम ।
लक्ष भक्त श्रीमन्त, अनुसरण करते पन्थम ।
रविकर बोलो भक्त, निगलते कैसे मच्छी ।
आशा उगले राम, रोज खा कर जो छिच्छी ।।  
जस्टिस वर्मा को मिले, भाँति-भाँति के मेल ।
रेपिस्टों की सजा पर, दी दादी भी ठेल ।
दी दादी भी ठेल, कत्तई मत अजमाना ।
सही सजा है किन्तु, जमाना मारे ताना ।
जो भी औरत मर्द, रेप सम करे अधर्मा ।
चेंज करा के सेक्स, सजा दो जस्टिस वर्मा ।।

लक्ष्मण रेखा खींच के, जाय बहाना पाय ।
खून बहाना लूटना, दे मरजाद मिटाय ।
दे मरजाद मिटाय, सदी इक्कीस आ गई ।
किन्तु सोच उन्नीस, बढ़ी है नीच अधमई ।
पुरुषों के कुविचार, जले पर केवल रावण।
 रेखा चलूं नकार, पुरुष भव खींचा, लक्ष्मण ।
आगे दारुण कष्ट दे, फिर काँपे संसार |
नाबालिग को छोड़ते, जिसका दोष अपार |
जिसका दोष अपार, विकट खामी कानूनी |
भीषण अत्याचार, करेगा दुष्ट-जुनूनी |
लड़-का-नूनी काट, कहीं पावे नहिं भागे |
श्रद्धांजली विराट, तख़्त फांसी पर आगे ||

दुनिया भागमभाग में, घायल पड़ा शरीर |
सुने नहीं कोई वहां, करे बड़ी तकरीर |
करे बड़ी तकरीर, सोच क्या बदल चुकी है |
नहीं बूझते पीर, निगाहें आज झुकी हैं |
सामाजिक कर्तव्य, समझना होगा सबको |
अरे धूर्तता छोड़, दिखाना है मुँह रब को ||
 मिनी इण्डिया जागता, सोया भारत देश |
फैली मृग मारीचिका, भला करे आवेश |
  भला करे आवेश, रेस नहिं लगा नाम हित |  
लगी मर्म पर ठेस, जगाये रखिये यह नित |
 करिए औरत मर्द, सुरक्षित दिवस यामिनी |
रक्षित नैतिक मूल्य, बचाए सदा दामिनी ||

आँखों में बेचैनियाँ, काँप दर्द से जाय |
सांत्वना से आपकी, नहीं रूह विलखाय |
नहीं रूह विलखाय, खाय ली देह हमारी |
लाखों लेख लिखाय, बचे पर अत्याचारी |
है भारत धिक्कार, रेप हों हर दिन लाखों |
मरें बेटियाँ रोज, देखते अपनी आँखों ||

  
बीस साल का हाल है, काल बजावे गाल ।
पश्चिम का जंजाल कह, नहीं गलाओ दाल ।
नहीं गलाओ दाल, दाब जब कम हो जाये ।
काली-गोरी दाल, नहीं रविकर पक पाए ।
होवे पेट खराब, नहीं जिम्मा बवाल का ।
खुद से खुद को दाब, तजुर्बा बीस साल का ।।

हारा कुल अस्तित्व ही, जीता छद्म विचार |
वैदेही तक देह कुल, होती रही शिकार |
होती रही शिकार, प्रपंची पुरुष विकारी |
चले चाल छल दम्भ, मकड़ जाले में नारी |
सहनशीलता त्याग, पढाये पुरुष पहारा |
ठगे नारि को रोज, झूठ का लिए सहारा ||
हदे पार करते रहे, जब तब दुष्टाबादि |
*अहक पूरते अहर्निश, अहमी अहमक आदि |
अहमी अहमक आदि, आह आदंश अमानत |
करें नारि-अपमान, इन्हें हैं लाखों लानत |
बहन-बेटियां माय, सुरक्षित प्रभुवर करदे |
नाकारा कानून  व्यवस्था व्यर्थ ओहदे ||

*इच्छा / मर्जी


हिला हिला सा हिन्द है, हिले हिले लिक्खाड़ |

भांजे महिला दिवस पर, देते भूत पछाड़ |

देते भूत पछाड़, दहाड़े भारत वंशी |

भांजे भांजी मार, चाल चलते हैं कंसी |

बड़े ढपोरी शंख, दिखाते ख़्वाब रुपहला |
  
महिला नहिं महफूज, दिवस बेमकसद महिला ||

गोया गैया गोपियाँ, गोरखधंधा गोप |
बन्धन में वे बाँध के,  मन की मर्जी थोप | 

मन की मर्जी थोप, नारि को हरदम लूटा |
कर इनको आजाद, अन्यथा तोड़े खूंटा |

वही काटते आज, जमाने ने जो बोया |
रहें कुंवारे पुरुष, अश्रु से नयन भिगोया ||


  नारि-सशक्तिकरण में, जगह जगह खुरपेंच |
राम गए मृग छाल हित, लक्ष्मण रेखा खेंच |
लक्ष्मण रेखा खेंच, नीच रावण है ताके |
साम दाम भय भेद, प्रताणित करे बुलाके |

अक्षम है कानून, पुलिस अपनों से हारी |
नारि नहीं महफूज, लूटते रहे *अनारी ||


सकते में हैं जिंदगी, माँ - बहनों की आज |
प्रश्न चिन्ह सम्बन्ध पर, आय नारि को लाज |
आय नारि को लाज, लाज लुट रही सड़क पर |
दब जाए आवाज, वहीँ पर जाती है मर |
कहीं नहीं महफूज, दुष्ट मिल जाँय बहकते |
बने सुर्खियाँ न्यूज, नहीं कुछ भी कर सकते ||

विष्णु-प्रिया पद चापती, है लक्ष्मी साक्षात |  
उधर कालिका दाबती, रख कर शिव पर लात |
रख कर शिव पर लात, रूप दोनों ही भाये |
नारीवादी किन्तु, विष्णु पर हैं भन्नाए |
शिव के सिर पर गंग, उधर कैकेयी की हद |
इत लक्ष्मी को मिला, प्यार से विष्णु-प्रिया पद ||





02 February, 2013

बीस साल तक छूट, कहीं यदि रेप-खरोंचे -



 सारा जग चालाक हैं, रखे पूत का ख्याल |
पहली कक्षा में दिया, चुरा लिया दो साल |
चुरा लिया दो साल, बहुत आगे की सोंचे |
बीस साल तक छूट, कहीं यदि रेप-खरोंचे |
बचे सजा से साफ़, कदाचित हो हत्यारा |
लास्ट लाउडली लॉफ़, न्याय अन्धा संसारा ||


शैतानों तानों नहीं,  कामी-कलुषित देह ।
तानों से भी डर मुए,  कर नफरत ना नेह ।
कर नफरत ना नेह, नहीं संदेह बकाया ।
बहुत बकाया देश, किन्तु बिल लेकर आया ।
छेड़-छाड़ अपमान, रेप हत्या मर-दानों ।
सजा हुई है फिक्स, मिले फांसी शैतानों ।।


लाठी हत्या कर चुकी, चुकी छुरे की धार |
कट्टा-पिस्टल गन धरो, बम भी हैं बेकार |
बम भी हैं बेकार, नया एक अस्त्र जोड़िये |
सरेआम कर क़त्ल, देह निर्वस्त्र छोड़िए | 
नाबालिग ले  ढूँढ़, होय बढ़िया कद-काठी |
मरवा दे कुल साँप,  नहीं टूटेगी लाठी ||


नाबालिग की पार्टी, मने वहाँ पर जश्न ।
जमा जन्म-तिथि देखकर, फँसने का क्या प्रश्न ।
फँसने का क्या प्रश्न, चलो मस्ती करते हैं ।
है सरकारी छूट, नपुंसक ही डरते हैं ।
पड़ो एकश: टूट, फटाफट हो जा फारिग ।
चार दिनों के बाद, रहें ना हम नाबालिग ।।



बालिग़ जब तक हो नहीं, चन्दा-तारे तोड़ ।
मनचाहा कर कृत्य कुल, बाहें रोज मरोड़ ।
बाहें रोज मरोड़, मार काजी को जूता ।
अब बाहर भी मूत, मोहल्ले-घर में मूता ।
चढ़े वासना ज्वार, फटाफट हो जा फारिग ।
फिर चाहे तो मार, अभी तो तू नाबालिग ।।



अंधी देवी न्याय की, चालें डंडी-मार |
पलड़े में सौ छेद हैं, डोरी से व्यभिचार |

डोरी से व्यभिचार, तराजू बबली-बंटी  |
देता जुल्म नकार, बजे खतरे की घंटी |

अमरीका इंग्लैण्ड, जुर्म का करें आकलन |
कड़ी सजा दें देश, जेल हो उसे आमरण ||



ब्रिटिश सांसद भी कहे, पहरावे में दोष ।
आधी आबादी सहे, कारण यह ही ठोस ।
कारण यह ही ठोस, रोष मत करना नारी ।
सैंडिल ऊंची छोड़, करो फिर से तैयारी ।
कोई हाथ लगाय, उठा जूतियाँ फटाफट ।
तुरत नाक-मुंह थूर, गिने बिन मार सटासट  ।।

 पैंट-शर्ट में पुरुष के, हमें दीखता दोष ।
अंत: वस्त्रों में दिखे, ज्यादा जोश खरोश ।
ज्यादा जोश खरोश, पहन अब वही जाँघिया ।
धोती-कुरता झाड, पजामा बनी धारियां ।
सात्विक भोजन होय, मूक फ़िल्में भी त्यागो ।
बदलो अपने ढंग, गोलियां यूँ मत दागो ।।

 कामा कामुक कामुकी, तन-मन से बीमार ।
ताना-बाना ध्वस्त कर, छोड़ भगे परिवार ।
छोड़ भगे परिवार, लूटते रहजन बनकर ।
सरेआम लें लूट, देह दिखती जो सुन्दर ।
ऐसे सेक्स एडिक्ट, करें सेक्सी हंगामा ।
नाता-रिश्ता भूल, दोहते कामुक कामा ।।