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17 March, 2012
कहाँ कटे मन गाँठ, विकल-मन रहता ऐंठा-
राधा-रमण जी शुक्रिया, बीरू जी आभार ।
गाँठ कटाई पीठ की, चौबीस घंटे पार ।
चौबीस घंटे पार, पुरानी बीस साल की ।
अनदेखी की बहुत, आज तक इस बवाल की ।
तन की गाँठ कटाय, दवा खाकर हूँ बैठा ।
कहाँ कटे मन गाँठ, विकल-मन रहता ऐंठा ।।
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