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14 December, 2017

लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी

अलमारियों में पुस्तकें सलवार कुरते छोड़ के।
गुड़िया खिलौने छोड़ के, रोये चुनरियाओढ़ के।
रो के कहारों से कहे रोके रहो डोली यहाँ।
माता पिता भाई बहन को छोड़कर जाये कहाँ।
लख अश्रुपूरित नैन से बारातियों की हड़बड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

हरदम सुरक्षित वह रही सानिध्य में परिवार के।
घूमी अकेले कब कहीं वह वस्त्र गहने धार के।
क्यूँ छोड़ने आई सखी, निष्ठुर हुआ परिवार क्यों।
अन्जान पथ पर भेजते अब छूटता घर बार क्यों।।
रोती गले मिलती रही, ठहरी नही लेकिन घड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

आओ कहारों ले चलो अब अजनबी संसार में।
शायद कमी कुछ रह गयी है बेटियों के प्यार में।
तुलसी नमन केला नमन बटवृक्ष अमराई नमन।
दे दो विदा लेना बुला हो शीघ्र रविकर आगमन।।
आगे बढ़ी फिर याद करती जोड़ती इक इक कड़ी।
लल्ली लगा ली आलता लावा उछाली चल पड़ी।।

09 November, 2017

सात वचन


चले जब तीर्थ यात्रा पर मुझे तुम साथ लोगे क्या।
सदा तुम धर्म व्रत उपक्रम मुझे लेकर करोगे क्या।
वचन पहला करो यदि पूर्ण वामांगी बनूँगी मैं

बताओ अग्नि के सम्मुख, हमेशा साथ दोगे क्या।।
सात वचन/2
कई रिश्ते नए बनते, मिले परिवार जब अपने।
पिता माता हुवे दो दो, बढ़े परिवार अब अपने।
करोगे एक सा आदर, वचन यदि तुम निभाओगे।
तभी वामांग में बैठूँ बने सम्बन्ध तब अपने।।

सात वचन/3
युवा तन प्रौढ़ता पाकर बुढ़ापा देखता आया।
यही तीनों अवस्थाएं हमेशा भोगती काया।
विकट चाहे परिस्थिति हो, करो मेरा अगर पालन।
तभी वामांग में बैठूँ, बनूँ मैं सत्य हमसाया।।

सात वचन/4
अभी तक तो कभी चिंता नहीं की थी गृहस्थी की।
हमेशा घूमते फिरते रहे तुम खूब मस्ती की।
जरूरत पूर्ति हित बोलो बनोगे आत्मनिर्भर तो
अभी वामांग में बैठूँ, शपथ लेकर पिताजी की।।

सात वचन /5
गृहस्थी हेतु आवश्यक सभी निर्णय करो मिलकर।
वचन दो मंत्रणा करके, करेंगे हर समस्या हल।
सकल व्यय-आय का व्यौरा बताओगे हमेशा तुम
वचन दो तो अभी वामांग में बैठूँ इसी शुभ पल।।

सात वचन (6)
अगर सखियों सहित बैठी नहीं मुझको बुलाओगे।
कभी भी दुर्वचन आकर नहीं कोई सुनाओगे।
जुआ से दुर्व्यसन सब से रहोगे दूर जीवन में
अभी वामांग में बैठूँ, वचन यदि यह निभाओगे।।

सात वचन (7)
पराई नारि को माता सरिस क्या देखता है मन।
रहे दाम्पत्य जीवन में परस्पर प्रेम अति पावन ।
कभी भी तीसरा कोई करे क्यों भंग मर्यादा-
वचन दो तो ग्रहण करती, अभी वामांग में आसन।।

विशुद्ध व्यक्तिगत
कुंडलियां छंद
ताके ध्रुव-तारा अटल, संग वैद्य उदरेश |
धर डाक्टर राजेंद्र सह, पुरखे नाना वेश | 
पुरखे नाना वेश, अग्नि प्रज्वलित कराएं |
होता मंत्रोच्चार, सात फेरे लगवायें | 
वर-वधु को आशीष, रहे दे, अपने आके | 
होय अटल अहिवात, अटल ध्रुवतारा ताके |

हरिगीतिका 
सद्ज्ञान-विद्या धाम शुभ,परिवेश नैसर्गिक छटा |
सद्भावनामय जौनपुर की मेघदूती शुभ घटा |
अरविन्द संध्या की सुता-सौभाग्य प्रियषा कौमुदी |
जय जय चिरंजीवी सुमित, शुभ पंचमी अगहन सुदी ||

वर पक्ष
शशिधर ने शशि को सौंप दिया।
खिल जाता लक्ष्मीकान्त हिया।
उस क्षीरजलधि की हलचल ने
तब सुमित-अमितमय विश्व किया।।

विनीत/दर्शनाभिलाषी
कमला दशरथ रविशंकर सौरभ कौस्तुभ अम्बुज संग पधारे |
सनतोष सरोज मनोज सुनील बृजेश शुभम अरु वैभव द्वारे |
लछमी ऊंकार ऋषभ दिवयांश विवेक ललित सुरयांश निहारे| 
अब अंकित आयुषमान विपुल मिसरा कुल के परिजन गण सारे

नाना पक्ष
विद्यासागर शुक्ल जी, इंद्रा जी के साथ।
नातिन के शुभ व्याह में, दिखे बँटाते हाथ।
दिखे बँटाते हाथ, साथ आशीष दे रहे।
राघवेंद्र देवेन्द्र, बलैया साथ ले रहे।
संग हरेंद्र रमेंद्र, प्राप्त होता शुभ अवसर।
देते सब आशीष, महात्मन विद्या सागर।।

शशिकांत राधाकांत मौसा भी उपस्थित हैं यहाँ।
ढोलक बजाने मे मगन हीरावती दादी जहाँ।
नानी जमा चाची जमा मौसी बुआ मामी सभी
वर पक्ष को अतिप्रेम से गाली सुनाती हैं वहाँ।।

10 October, 2017

शुभ विवाह/ सात वचन

अभिमुख ध्रुव-तारा लखे, पाणिग्रहण संस्कार | 
हुई प्रज्ज्वलित अग्नि-शुभ, होता मंत्रोच्चार | 
होता मंत्रोच्चार, सात फेरे लगवाते | 
सात वचन के साथ, एक दोनों हो जाते | 
ले उत्तरदायित्व, परस्पर बाँटें सुख-दुख | 
होय अटल अहिवात, कहे ध्रुव-तारा अभिमुख |

सात वचन/1

चले जब तीर्थ यात्रा पर मुझे तुम साथ लोगे क्या।
सदा तुम धर्म व्रत उपक्रम मुझे लेकर करोगे क्या।
वचन पहला करो यदि पूर्ण वामांगी बनूँगी मैं
बताओ अग्नि के सम्मुख, हमेशा साथ दोगे क्या।।

सात वचन/2

कई रिश्ते नए बनते, मिले परिवार जब अपने।
पिता माता हुवे दो दो, बढ़े परिवार अब अपने।
करोगे एक सा आदर, वचन यदि तुम निभाओगे।
तभी वामांग में बैठूँ बढ़े सम्बन्ध तब अपने।।

सात वचन/3

युवा तन प्रौढ़ता पाकर बुढ़ापा देखता आया।
यही तीनों अवस्थाएं हमेशा भोगती काया।
विकट चाहे परिस्थिति हो, करो मेरा अगर पालन।
अभी वामांग में बैठूँ, बनूँगी सत्य हमसाया।।

सात वचन/4

अभी तक तो कभी चिंता नहीं की थी गृहस्थी की।
हमेशा घूमते फिरते रहे तुम खूब मस्ती की।
जरूरत पूर्ति हित बोलो बनोगे आत्मनिर्भर तो
अभी वामांग में बैठूँ, शपथ लेकर पिताजी की।।