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09 April, 2013

रहा खुदा को भूल, बोलता खुद की जै जै-

कासी काबा कोसती, काया कोसों दूर । 
सुरसाई सुमिरै नहीं, सोहै सुरा सुरूर ।  

सोहै सुरा सुरूर, इसी में जीवन खोजै । 
रहा खुदा को भूल, बोलता खुद की जै जै । 

खाना पीना मौज, स्वार्थी अति कटु-भाषी । 
भोगे कष्ट-अपार,  प्राण की कठिन निकासी ।  



19 comments:

  1. कबीर की याद दिला दी महाराज ..
    अभिभूत हूँ !

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ...
    आभार

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  3. अपनी जय बोलने वालों की कमी नही है आदरणीय,बहुत ही उम्दा प्रस्तुती.

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  4. बहु खूब . सुन्दर . भाब पूर्ण कबिता . बधाई .

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  5. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें

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  6. बहुत अच्‍छी प्रस्‍तुति

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  7. कासी काबा कोसती, काया कोसों दूर ।
    सुरसाई सुमिरै नहीं, सोहै सुरा सुरूर ।

    क्या कहने
    बहुत सुंदर

    अंतिम दोहा भी लाजववाब है

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  8. बढ़िया प्रस्तुति है काबा काशी ........शुक्रिया चर्चा मंच में बिठाने का .

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  9. bahut khubsuurat rachna, aabhar

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  10. वाह गुरूजी वाह!!!!

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  11. जीवन दर्शन को उजागर करती सुंदर कुण्डलिया.......

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  12. जीवन दर्शन को उजागर करती सुंदर कुण्डलिया.......

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  13. अब यही चलन बनता जा रहा है

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  14. सुन्दर . भाब पूर्ण कबिता . नवरात्रि की हार्दिक शुभ कामनाएं
    भ्रमर ५

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  15. कथनी और करनी में अंतर रखना इंसानी फ़ितरत हो गई है!

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  16. बैसाखी की लाख लाख वधाइयों के साथ -माता स्कन्द माता की जय जय कार !!
    मीत आप हैं डालते, कुण्डलिनियों में जान |
    कुण्डलिया छोटी मगर, है कविता की शान ||

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  17. क्या बात है, बहुत खूब.
    "सुरसाई सुमिरै नहीं, सोहै सुरा सुरूर"
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति, मेरा हमेशा मानना है आप दोहा के बहुत बड़े उस्ताद है.

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  18. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.
    सादर

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